सीजी भास्कर, 13 जून। बेटियों के अधिकारों से जुड़े एक मामले में हाईकोर्ट के फैसले ने लोगों का ध्यान (Maintenance Rights) खींचा है। न्यायालय के इस निर्णय को लेकर कानूनी हलकों के साथ आम लोगों के बीच भी चर्चा तेज है। मामला एक ऐसी बेटी से जुड़ा है, जिसके भरण पोषण को लेकर पिता और परिवार के बीच लंबे समय से कानूनी विवाद चल रहा था।
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपने अपने तर्क रखे, लेकिन अदालत ने पूरे मामले का विस्तृत परीक्षण करने के बाद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने साफ किया कि केवल बालिग हो जाने भर से बेटी के प्रति पिता की जिम्मेदारी स्वतः समाप्त नहीं हो जाती, विशेषकर तब जब पहले से भरण पोषण का आदेश प्रभावी हो।
मनेंद्रगढ़ चिरमिरी भरतपुर जिले से जुड़े इस मामले में गोरखनाथ यादव ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए पुनर्विचार याचिका दायर की थी। फैमिली कोर्ट ने उनकी बेटी कु. प्रिया के पक्ष में भरण पोषण देने का आदेश जारी किया था।
पहले तय हुई थी मासिक राशि : Maintenance Rights
मामले के रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2016 में फैमिली कोर्ट ने बेटी के लिए दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण पोषण राशि निर्धारित की थी। बाद में परिस्थितियों और आवश्यकताओं को देखते हुए वर्ष 2023 में इस राशि को बढ़ाकर पांच हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया गया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए पिता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था और आदेश में हस्तक्षेप की मांग की थी।
पिता ने रखे ये तर्क
याचिका में पिता की ओर से कहा गया कि उनकी बेटी अब बालिग हो चुकी है, इसलिए भरण पोषण का अधिकार समाप्त माना जाना चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बच्ची की मां के पास पर्याप्त कृषि भूमि और आय के साधन उपलब्ध हैं, जिससे उसका पालन पोषण किया जा सकता है। सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि पारिवारिक परिस्थितियों में मतभेद हैं और मामले से जुड़े अन्य पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अदालत ने क्या कहा
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि वर्ष 2016 से भरण पोषण संबंधी आदेश लगातार लागू है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आदेश को पहले कभी चुनौती नहीं दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इतने वर्षों तक आदेश लागू रहने के बाद अब अचानक रिश्ते और जिम्मेदारी पर सवाल उठाना उचित नहीं माना जा सकता।
जिम्मेदारी से नहीं हो सकते मुक्त
फैसले में कहा गया कि संतान के पालन पोषण की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी पिता (Maintenance Rights) की होती है। अदालत ने माना कि केवल बेटी के बालिग होने के आधार पर पूर्व से लागू भरण पोषण आदेश को समाप्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में परिस्थितियों और पहले से प्रभावी आदेशों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
याचिका हुई खारिज
हाईकोर्ट ने पिता की पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। इसके साथ ही बेटी को प्रतिमाह पांच हजार रुपये भरण पोषण देने का निर्देश यथावत रखा गया। इस फैसले को बेटियों के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें अदालत ने अभिभावकीय जिम्मेदारियों को लेकर स्पष्ट संदेश दिया है।





