सीजी भास्कर, 2 मार्च। पहली शादी कानूनी रूप से समाप्त किए बिना दूसरी शादी करना और बाद में भरण-पोषण की मांग करना कानूनन स्वीकार्य (Marriage Legal Issue) नहीं है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट करते हुए महिला की याचिका खारिज कर दी।
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट, दुर्ग के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि पहली शादी विधिवत समाप्त हुए बिना दूसरी शादी करना हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैध नहीं माना जा सकता।
क्या था पूरा मामला?
भिलाई निवासी महिला ने 10 जुलाई 2020 को आर्य समाज मंदिर में दूसरी शादी की थी। आरोप है कि उसने पहली शादी से तलाक लिए बिना खुद को अविवाहित बताकर यह विवाह (Marriage Legal Issue) किया। कुछ समय बाद वैवाहिक विवाद उत्पन्न हुआ और महिला अलग रहने लगी।
इसके बाद महिला ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत दूसरे पति से गुजारा भत्ता की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की। उसने दावा किया कि उसके पति की मासिक आय लगभग 5 लाख रुपये है और उसे हर माह एक लाख रुपये भरण-पोषण दिया जाए। फैमिली कोर्ट, दुर्ग ने 20 जनवरी 2026 को याचिका खारिज कर दी थी। इस आदेश को महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि महिला ने अपनी पहली शादी का तथ्य छिपाया और कानूनी रूप से विवाह विच्छेद किए बिना दूसरी शादी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पहली शादी विधिक रूप से अस्तित्व में हो, तब दूसरी शादी करना न केवल अवैध (Marriage Legal Issue) है, बल्कि ऐसे संबंध के आधार पर भरण-पोषण का दावा भी मान्य नहीं हो सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है और उसे बरकरार रखा। परिणामस्वरूप, महिला की मेंटनेंस संबंधी याचिका खारिज कर दी गई।
कानूनी दृष्टिकोण
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पहली शादी समाप्त किए बिना दूसरी शादी शून्य (void) मानी जाती है। ऐसे में धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण का दावा तभी स्वीकार्य होता है, जब विवाह वैध हो। यह फैसला वैवाहिक मामलों में तथ्यों को छिपाने और कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने के गंभीर परिणामों की ओर संकेत करता है।






