सीजी भास्कर, 02 जनवरी। अक्सर मन में यह प्रश्न उठता है कि जब ईश्वर (Premanand Maharaj) पूर्ण हैं, तो उन्होंने इस संसार की रचना क्यों की? क्या कोई आवश्यकता थी या कोई उद्देश्य? इसी गूढ़ प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रेमानंद महाराज ने अपने हालिया प्रवचन में सृष्टि के पीछे छिपे आध्यात्मिक भाव को बेहद सहज उदाहरणों के साथ समझाया।
सृष्टि कोई मजबूरी नहीं, ईश्वर की सहज लीला
प्रेमानंद महाराज ने कहा कि यह संसार किसी अभाव या मजबूरी का परिणाम (Premanand Maharaj) नहीं है। ईश्वर को न कुछ पाना है, न कुछ सिद्ध करना। संसार की रचना उनकी स्वाभाविक लीला है। उन्होंने वेदांत के सिद्धांत “एकोहं बहुस्याम” का उल्लेख करते हुए बताया कि परमात्मा ने स्वयं को अनेक रूपों में प्रकट किया, ताकि वही स्वयं के साथ खेल सकें।
महाराज के अनुसार, इस लीला में ईश्वर ही कर्ता हैं, वही भोगता हैं और वही साक्षी भी। जैसे बच्चे खेल-खेल में मिट्टी के घर बनाते हैं और फिर उन्हें तोड़ देते हैं, वैसे ही यह सृष्टि भी ईश्वर की खेल भावना का विस्तार है—न लाभ, न हानि।
माया और योगनिद्रा से चलता है सृष्टि चक्र
उन्होंने स्पष्ट किया कि ईश्वर के भीतर कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं होती। सृष्टि तब प्रकट होती है जब परमात्मा की योगनिद्रा में स्थित माया सक्रिय होती है। यही माया प्रकृति, समय और कर्म के माध्यम से सृष्टि के चक्र को आगे बढ़ाती है। जन्म, जीवन और मृत्यु—ये सभी इसी चक्र का हिस्सा हैं।
बुद्धि नहीं, भक्ति से होता है बोध
प्रेमानंद महाराज ने चेतावनी भी दी कि मनुष्य की सीमित बुद्धि ईश्वर के पूर्ण स्वरूप को नहीं समझ सकती। बुद्धि स्वयं प्रकृति (Premanand Maharaj) का एक अंश है, इसलिए वह परम सत्य को पूरी तरह पकड़ने में असमर्थ है। उनके शब्दों में, “ईश्वर को जानने का मार्ग तर्क नहीं, समर्पण और भक्ति है।” उन्होंने कहा कि निरंतर स्मरण, नाम जप और श्रद्धा के साथ किया गया भक्ति मार्ग ही वह साधन है, जिससे ईश्वर का अनुभव संभव हो पाता है।
श्रद्धा से खुलता है सृष्टि का रहस्य
अपने संदेश के अंत में संत ने कहा कि सृष्टि का उद्देश्य समझने के लिए सवाल करना गलत नहीं, लेकिन केवल तर्क पर अटक जाना भी समाधान नहीं है। जब मनुष्य अहं को छोड़कर श्रद्धा के साथ आगे बढ़ता है, तभी उसे ईश्वर की लीला का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।






