सीजी भास्कर, 21 जून : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (Private School RTI Case) ने निजी शिक्षण संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल किसी सरकारी उपक्रम से फीस प्रतिपूर्ति प्राप्त करने या सीमित वित्तीय व्यवस्था होने मात्र से कोई निजी स्कूल सूचना के अधिकार कानून के तहत सार्वजनिक संस्था नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी निजी संस्थान को सूचना अधिकार कानून के दायरे में लाने के लिए उस पर सरकार का व्यापक नियंत्रण अथवा पर्याप्त सरकारी वित्तीय सहायता होना आवश्यक है।
यह महत्वपूर्ण फैसला कोरबा के डीएवी पब्लिक स्कूल द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ ने दिया। अदालत ने केंद्रीय सूचना आयोग के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें स्कूल को सार्वजनिक प्राधिकरण मानते हुए उसके प्राचार्य को जनसूचना अधिकारी की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी। साथ ही सूचना उपलब्ध नहीं कराने पर लगाया गया पांच हजार रुपये का जुर्माना भी रद्द कर दिया गया।
विवाद की शुरुआत एक पूर्व कर्मचारी के सेवा संबंधी मामले से हुई थी। कर्मचारी के परिजनों ने सूचना अधिकार कानून के तहत स्कूल प्रशासन से कुछ जानकारियां मांगी थीं। मामला केंद्रीय सूचना आयोग तक पहुंचा, जहां स्कूल को सूचना अधिकार कानून के दायरे में माना गया था। इसी आदेश को स्कूल प्रबंधन ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
सरकारी मदद और सरकारी नियंत्रण अलग-अलग बातें
सुनवाई के दौरान स्कूल प्रबंधन ने अदालत को बताया कि संस्था का संचालन दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज ट्रस्ट एंड मैनेजमेंट सोसायटी द्वारा किया जाता है और यह पूरी तरह स्व-वित्तपोषित निजी शिक्षण संस्थान है। अदालत (Private School RTI Case) ने पाया कि दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड के कर्मचारियों के बच्चों को रियायती शिक्षा उपलब्ध कराने और उससे होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए की गई व्यवस्था को पर्याप्त सरकारी वित्तपोषण नहीं माना जा सकता।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 2(एच) के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित किए जाने के लिए केवल आर्थिक लेन-देन पर्याप्त नहीं है। इसके लिए संस्था पर सरकार का प्रभावी नियंत्रण या पर्याप्त सरकारी वित्तीय निर्भरता साबित होना जरूरी है।
देशभर के निजी स्कूलों पर पड़ेगा असर
कानूनी जानकारों के अनुसार यह फैसला देशभर के निजी और स्व-वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि सीमित सरकारी सहयोग प्राप्त करने वाले निजी स्कूल स्वतः सूचना अधिकार कानून के दायरे में नहीं आएंगे, जब तक कि उन पर सरकार का प्रत्यक्ष और व्यापक नियंत्रण स्थापित न हो।





