उदंती–सीतानदी टाइगर रिज़र्व—जहाँ शांति, संरक्षण और सख़्त नियमों की उम्मीद की जाती है—वहीं हालिया घटनाक्रम ने Tiger Reserve Timber Controversy को जन्म दे दिया है। ज़मीनी स्तर पर सामने आई तस्वीरें और दावे किसी संरक्षण-कथा से ज़्यादा, नियमों की कसौटी पर खड़े असहज सवालों जैसी लगती हैं।
आम नागरिक पर सख़्ती, ‘विशेष’ पर चुप्पी?
यह वही क्षेत्र है जहाँ शाम के बाद आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध हैं और सूखी लकड़ी उठाने तक पर कार्रवाई हो जाती है। ऐसे में आरोप है कि प्रतिबंधित समय में सरकारी वाहन के ज़रिये लकड़ी का परिवहन हुआ—और वह भी बिना वैध काग़ज़ी अनुमति के। यही विरोधाभास Protected Area Scrutiny को और तेज़ करता है।
सरकारी वाहन, रात का समय, वैध पर्ची का सवाल
स्थानीय दावों के अनुसार लकड़ी सरकारी गाड़ी में ले जाई गई। सवाल यह भी उठ रहा है कि वाहन कौन चला रहा था और क्या परिवहन के लिए आवश्यक अनुमति/पर्ची मौजूद थी। यदि अनुमति नहीं थी, तो यह Illegal Timber Transport की श्रेणी में क्यों नहीं आएगा—यही मूल प्रश्न है।

नियम लकड़ी की नहीं, नीयत की परीक्षा लेते हैं
वन कानून में मात्रा से अधिक, नीयत और प्रक्रिया मायने रखती है। संरक्षित क्षेत्र से लकड़ी ले जाना—चाहे छोटी हो या बड़ी—कानूनी कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। अगर प्रक्रिया टूटी, तो Forest Law Violation का सवाल स्वाभाविक है, चाहे वाहन किसी का भी हो।
‘रक्षक बनाम भक्षक’ की बहस क्यों उठी
जब संरक्षण की ज़िम्मेदारी निभाने वाली व्यवस्था पर ही उंगली उठे, तो बहस तेज़ होती है। यहाँ मुद्दा सिर्फ लकड़ी का नहीं, विश्वास का है—कि क्या कानून सबके लिए समान है, या कुछ मामलों में वह किनारे खड़ा दिखता है।

जांच के बुनियादी प्रश्न अब भी खुले
अब कई बुनियादी प्रश्न अनुत्तरित हैं—
क्या परिवहन की वैधानिक अनुमति थी?
क्या पर्ची काटी गई?
यदि नहीं, तो वाहन और संबंधित जिम्मेदारियों पर क्या कार्रवाई होगी?
और क्या सरकारी वाहन पर वही मानक लागू होंगे जो किसी आम नागरिक पर होते हैं?
विरासत की रक्षा, चयनात्मकता नहीं
उदंती–सीतानदी सिर्फ जंगल नहीं, आने वाली पीढ़ियों की विरासत है। यदि नियम चयनात्मक हुए, तो संरक्षण भाषणों और पोस्टरों तक सिमट जाएगा। आज सवाल लकड़ी का है—कल जंगल का—और परसों वही वन्यजीव पूछेंगे कि उनकी सुरक्षा का दायित्व किसके हाथ में है।





