वॉशिंगटन। US-China Tech Deal : वैश्विक राजनीति में ‘सुरक्षा बनाम मुनाफा’ की जंग अब खुलकर सामने आ गई है। एक विस्तृत जांच में खुलासा हुआ है कि अमेरिका ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) को दरकिनार करते हुए चीन को तकनीकी रूप से सक्षम बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। रिपोर्ट के अनुसार, बीते दो दशकों में पांच अलग-अलग अमेरिकी प्रशासनों ने अपनी ही टेक कंपनियों को चीन की पुलिस और सरकारी एजेंसियों को जासूसी तकनीक (Spy Technology) बेचने की छूट दी।
क्लाउड सर्विस के ‘Loophole’ से चीन बना रहा है अपना AI साम्राज्य
हालांकि अमेरिका ने उन्नत चिप्स की सीधी बिक्री पर रोक लगाई थी, लेकिन चीन ने इसका रास्ता ‘क्लाउड सर्विस’ (Cloud Service Loophole) से निकाल लिया। रिपोर्ट के अनुसार, चीन अमेरिकी कंपनियों जैसे माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़न से High-End Chips को किराए पर लेकर अपने AI Models को ट्रेन कर रहा है। इस खामी को बंद करने की कोशिशें चार बार हुईं, लेकिन हर बार टेक लॉबी के दबाव में उन्हें रोक दिया गया।
लॉबिंग में खर्च हुए करोड़ों डॉलर, तकनीकी व्यापार पर सियासी सौदेबाजी
अमेरिकी टेक कंपनियों ने चीन से जुड़े कानूनों और बिलों को प्रभावित करने के लिए करोड़ों डॉलर लॉबिस्टों (Tech Lobby) पर खर्च किए। उनका तर्क था कि अगर अमेरिका ने व्यापारिक रास्ते बंद किए, तो चीन अपनी खुद की तकनीक विकसित कर लेगा — जो अंततः अमेरिका के ही लिए नुकसानदेह साबित होगा। इस बीच, कई बड़ी कंपनियां सरकारी नियमों के बीच अपना आर्थिक संतुलन साधने में जुटी रहीं।
सरकार को भी मिला हिस्सा, सुरक्षा पर भारी पड़ा मुनाफा
ट्रंप प्रशासन ने एनवीडिया और एएमडी जैसी कंपनियों के साथ Tech Deal with China के जरिए नई नीति बनाई, जिसके तहत चिप्स की बिक्री पर लगी पाबंदियों में ढील दी गई। बदले में अमेरिकी सरकार को 15% राजस्व हिस्सा और इंटेल में 10% की सरकारी हिस्सेदारी मिली। यानी, अमेरिकी टैक्सपेयर्स का पैसा अब अप्रत्यक्ष रूप से चीन को तकनीक बेचने से होने वाले मुनाफे से जुड़ चुका है।
उइगर निगरानी में इस्तेमाल हो रही अमेरिकी तकनीक
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि यही अमेरिकी तकनीक चीन के शिनजियांग प्रांत में Uighur Surveillance (AI Surveillance in China) के लिए उपयोग की जा रही है। रिपोर्ट में सामने आया है कि इस तकनीक से उइगर मुसलमानों की हर गतिविधि पर नजर रखी जाती है — यहां तक कि निजी स्थानों तक में निगरानी कैमरे लगाए गए। यह स्थिति न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है बल्कि अमेरिका की नीति विरोधाभास को भी उजागर करती है।
विशेषज्ञ बोले – यह ‘रणनीतिक आत्मघात’ है
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के मुताबिक, यह पूरा मामला अमेरिका की “Strategic Failure” (रणनीतिक विफलता) साबित हुआ है। जिसने अपनी ही नीतियों से अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी चीन को ‘टेक सुपरपावर’ बनने का रास्ता दिखा दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका ने सुरक्षा और नैतिक मूल्यों की कीमत पर व्यापारिक हितों को तरजीह देकर दीर्घकालिक खतरा मोल ले लिया है।


