सीजी भास्कार 30 दिसम्बर Why Bhog Is Offered to God : हिंदू धर्म में पूजा-पाठ केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित करने की एक गहरी प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया का अहम हिस्सा है भगवान को भोग अर्पित करना। अक्सर लोग पूछते हैं कि जब ईश्वर स्वयं भोजन नहीं करते, तो भोग लगाने की आवश्यकता क्यों है? शास्त्रों के अनुसार, भोग लगाना ईश्वर को खिलाने से ज्यादा, स्वयं के भीतर अनुशासन और शुद्धता स्थापित करने का माध्यम है.
शास्त्रों में भोग का आध्यात्मिक अर्थ
वेद और पुराण बताते हैं कि अन्न केवल भौतिक वस्तु नहीं है, उसमें विचार, भावना और ऊर्जा समाहित होती है। जब भोजन बिना अर्पण के ग्रहण किया जाता है, तो उसमें कर्म दोष जुड़ सकता है। भगवान को भोग अर्पित करने से अन्न शुद्ध हो जाता है और वही भोजन प्रसाद का रूप ले लेता है, जो शरीर के साथ-साथ मन को भी स्थिर करता है .
भोग और अन्न शुद्धि का संबंध
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रसोई में बनने वाला हर भोजन व्यक्ति की मानसिक स्थिति से प्रभावित होता है। भोग अर्पण के दौरान मंत्र, श्रद्धा और समर्पण उस भोजन की नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर देते हैं। यही कारण है कि शास्त्र कहते हैं, भोग के बाद भोजन करने से अन्न दोष नहीं लगता और जीवन में संतुलन बना रहता है.
त्याग और सेवा की भावना कैसे विकसित होती है
भोग केवल भगवान के लिए नहीं, समाज के लिए भी एक संदेश देता है। जब कोई व्यक्ति अपने पसंदीदा व्यंजन को पहले ईश्वर को अर्पित करता है और फिर दूसरों में बांटता है, तो उसमें स्वार्थ धीरे-धीरे सेवा में बदल जाता है। यही परंपरा मंदिरों में प्रसाद वितरण और भंडारे के रूप में दिखाई देती है, जहां जाति, वर्ग और पहचान का भेद समाप्त हो जाता है।
भोग से अहंकार क्यों होता है कम
भोग अर्पण व्यक्ति को यह स्मरण कराता है कि जो कुछ भी उसके पास है, वह केवल उसका नहीं है। धन, अन्न और सामर्थ्य—सब ईश्वर की देन हैं। जब भोजन से पहले भोग लगाया जाता है, तो ‘मैं’ और ‘मेरा’ की भावना कमजोर पड़ती है और विनम्रता का जन्म होता है, जो आध्यात्मिक विकास की पहली सीढ़ी मानी जाती है.
भोग के बाद भोजन करने की परंपरा
शास्त्रों में कहा गया है कि देवताओं को अर्पित भोजन ही मनुष्य के लिए योग्य होता है। ऐसा भोजन सात्विक गुणों से भरपूर माना जाता है। इसका प्रभाव केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मानसिक शांति, संयम और सकारात्मक सोच को भी मजबूत करता है।
भोग का सामाजिक संदेश
भोग की परंपरा यह सिखाती है कि जीवन में जो भी मिले, उसे अकेले उपभोग करने के बजाय साझा करना चाहिए। यही कारण है कि भक्ति की चरम अवस्था में व्यक्ति समाज से कटता नहीं, बल्कि उससे और गहराई से जुड़ता है। भोग, प्रसाद और सेवा—तीनों मिलकर भारतीय संस्कृति की आत्मा को जीवित रखते हैं.






