सीजी भास्कर, 05 मई : भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद एक बार फिर गहरा गया है। नेपाल की बालेन सरकार ने लिपुलेक दर्रे से होकर कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Pilgrimage) के संचालन को लेकर भारत और चीन दोनों देशों को कूटनीतिक पत्र (Diplomatic Letter) भेजकर अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। नेपाल का दावा है कि लिपुलेक का क्षेत्र उसकी संप्रभु भूमि का हिस्सा है और वहां बिना उसकी अनुमति के किसी भी प्रकार की गतिविधि स्वीकार नहीं की जाएगी। हालांकि, भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए नेपाल के दावों को पूरी तरह आधारहीन करार दिया है।
नेपाल सरकार का कड़ा रुख
नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोकबहादुर पौडेल क्षेत्री ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि लिपुलेक मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Pilgrimage) शुरू करने की योजना नेपाल की क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल के अनुसार, यह विरोध किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि नेपाल की सभी राजनीतिक पार्टियों का साझा निर्णय है। नेपाल सरकार ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि वे पहले भी भारत को इस क्षेत्र में सड़क निर्माण, व्यापार या तीर्थयात्रा जैसी गतिविधियों से बचने की सलाह दे चुके हैं, लेकिन अब वे इसका औपचारिक और कूटनीतिक विरोध कर रहे हैं।
भारत का दो टूक जवाब
नेपाल की आपत्ति पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत के विदेश मंत्रालय ने दो टूक शब्दों में कहा कि लिपुलेक पास सदियों से भारतीय क्षेत्र का अभिन्न अंग रहा है। भारत ने स्पष्ट किया कि कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Pilgrimage) के लिए तीर्थयात्री साल 1954 से ही इसी पारंपरिक मार्ग का उपयोग कर रहे हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयान में कहा गया कि नेपाल के नए दावे न तो ऐतिहासिक तथ्यों की कसौटी पर टिकते हैं और न ही इनका कोई ठोस कानूनी या न्यायसंगत आधार है।
विवाद की जड़ और कूटनीतिक तनाव
यह विवाद तब और बढ़ गया जब नेपाल की वर्तमान सरकार ने लिपुलेक, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपने नक्शे में दिखाने की प्रतिबद्धता दोहराई। जानकारों का मानना है कि नेपाल की आंतरिक राजनीति और चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण काठमांडू ऐसे कदम उठा रहा है। दूसरी ओर, भारत ने साफ कर दिया है कि सीमा से जुड़े मुद्दों पर वह अपनी स्थिति स्पष्ट रखता है और किसी भी प्रकार के दबाव में आकर अपने ऐतिहासिक अधिकारों से समझौता नहीं करेगा।


