सीजी भास्कर, 30 मई : छत्तीसगढ़ की ‘सियासी माटी’ में जल, जंगल और जमीन (CG Tribal Congress Protest) के असली हकदारों की पहचान को लेकर एक ऐसा भयंकर वैचारिक और राजनीतिक बवंडर उठ खड़ा हुआ है, जिसने सीधे तौर पर दिल्ली से लेकर रायपुर तक की सत्ता को हिलाकर रख दिया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आदिवासी समाज की पारंपरिक पहचान, अनूठी संस्कृति और उनके विशेष संवैधानिक अधिकारों पर कथित रूप से किए जा रहे हमलों के खिलाफ आज राजधानी रायपुर की सड़कों पर एक बहुत बड़ा और आक्रामक जन-आक्रोश देखने को मिला।
रायपुर जिला आदिवासी कांग्रेस ने इस पूरे मामले को लेकर सीधे तौर पर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और उग्र नारेबाजी के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का पुतला फूंक डाला। इस हाई-प्रोफाइल विरोध प्रदर्शन के बाद पूरे प्रदेश में (CG Tribal Congress Protest) को लेकर चर्चाएं बेहद तेज हो गई हैं, क्योंकि यह लड़ाई सीधे तौर पर आदिवासियों के अस्तित्व और उनके स्वाभिमान से जुड़ी हुई है।
दरअसल, यह पूरा विवाद केवल एक सामान्य राजनीतिक प्रदर्शन नहीं है, बल्कि इसके पीछे ‘आदिवासी’ बनाम ‘वनवासी’ शब्द की वो पुरानी और गहरी दार्शनिक जंग है जो चुनाव आते ही और ज्यादा भड़क जाती है। रायपुर जिला आदिवासी कांग्रेस के अध्यक्ष दीपेश कृपाल के आक्रामक नेतृत्व में आयोजित इस आंदोलन में कांग्रेस के कई कद्दावर दिग्गज और हजारों की संख्या में आदिवासी कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए। जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कुमार शंकर मेनन और पूर्व विधायक विकास उपाध्याय जैसे कद्दावर नेताओं की मौजूदगी ने इस आंदोलन को और ज्यादा धार दे दी। जब कांग्रेस का यह हुजूम कलेक्ट्रेट और मुख्य चौराहों की तरफ बढ़ा, तो पुलिस प्रशासन के भी हाथ-पांव फूल गए। इस वैचारिक मतभेद और आदिवासी पहचान की रक्षा के लिए कड़ा कदम (CG Tribal Congress Protest) उठाते हुए कांग्रेसियों ने बीच सड़क पर ही धरना दे दिया।
अमित शाह के पुतले पर फूटा गुस्सा
आंदोलन के दौरान सबसे तीखा और सस्पेंस से भरा मोड़ तब आया जब कांग्रेसी नेताओं ने सीधे तौर पर संघ और बीजेपी की नीतियों को कटघरे में खड़ा किया। मंच से गरजते हुए वक्ताओं ने साफ तौर पर आरोप लगाया कि भाजपा-आरएसएस एक सोची-समझी और गहरी साजिश के तहत आदिवासी समाज की ऐतिहासिक पहचान और बाबा साहब अंबेडकर द्वारा दिए गए संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने का षड्यंत्र रच रही है। उन्होंने कड़े लहजे में कहा कि ‘आदिवासी’ शब्द इस देश के मूल निवासियों की अनंतकालीन पहचान और गरिमा का प्रतीक है, जबकि ‘वनवासी’ शब्द उन पर जबरन थोपकर उनके जल, जंगल और जमीन के कानूनी अधिकारों को छीनने का प्रयास किया जा रहा है, जिसे यह समाज किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा। इस पहचान पर होने वाले नुकसान (CG Tribal Congress Protest) को रोकने के लिए अब आदिवासी समाज आर-पार की लड़ाई के मूड में आ चुका है।
इसी वैचारिक आक्रोश के बीच कार्यकर्ताओं ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का प्रतीकात्मक पुतला हवा में लहराया और पुलिस की बैरिकेडिंग को तोड़ते हुए उसमें आग लगा दी। पुतला दहन के दौरान पूरा आसमान “हम वनवासी नहीं, आदिवासी हैं!” और “जल, जंगल, जमीन हमारा अधिकार है!” जैसे गगनभेदी नारों से गूंज उठा। प्रदर्शन में प्रदेश आदिवासी कांग्रेस संगठन प्रभारी कुलदीप ध्रुव, जग्गू ठाकुर, जश्बीर ढिल्लन और अभिषेक कसार सहित सैकड़ों पदाधिकारियों ने एकजुट होकर इस नीति के खिलाफ हुंकार भरी। इस राजनीतिक जंग ने यह साफ कर दिया है कि बस्तर से लेकर सरगुजा तक के वनांचल क्षेत्रों की राजनीति में बदलाव (CG Tribal Congress Protest) की यह नई लहर अब सीधे तौर पर राजधानी रायपुर के रास्ते केंद्र सरकार को चुनौती दे रही है, जिसे आगामी चुनावों का मुख्य एजेंडा माना जा रहा है।
‘संवैधानिक अधिकारों पर डाका डाला तो चुप नहीं बैठेंगे’
रायपुर की सड़कों पर हुए इस जोरदार शक्ति प्रदर्शन ने यह साबित कर दिया है कि आदिवासी समाज अब अपने अधिकारों को लेकर पूरी तरह से जागरूक हो चुका है। पूर्व विधायक विकास उपाध्याय और जिला अध्यक्ष दीपेश कृपाल ने अधिकारियों को दोटूक शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि यह तो सिर्फ एक झांकी है। अगर बीजेपी और आरएसएस ने अपनी इस ‘वनवासी’ वाली मानसिकता को नहीं बदला और पांचवीं-छठी अनुसूची के तहत मिलने वाले अधिकारों से छेड़छाड़ की, तो पूरा छत्तीसगढ़ चक्काजाम कर दिया जाएगा। उन्होंने साफ कहा कि आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए कांग्रेस अब गांव-गांव जाकर एक नया नियम (CG Tribal Congress Protest) और जन-जागरूकता अभियान शुरू करने जा रही है, जिसके तहत आदिवासियों को एकजुट किया जाएगा।




