सीजी भास्कर, 30 मई : कड़ी मेहनत, आंसुओं से सने संघर्ष और फौलादी हौसले के दम पर गरीबी की जंजीरों को तोड़कर छत्तीसगढ़ के वनांचल के एक आदिवासी बेटे ने वो मुकाम हासिल कर लिया है, जिसे देखकर आज पूरे बस्तर संभाग की छाती गर्व से चौड़ी हो गई है। कोंडागांव जिले के बड़ेराजपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत हरवेल के एक बेहद छोटे और पिछड़े आश्रित ग्राम डीहीपारा के रहने वाले श्रवण कुमार मरकाम ने भारतीय सेना (CG Agniveer Shravan) की अत्यंत कठिन ‘अग्निवीर’ भर्ती परीक्षा को फतह कर लिया है।
एक बेहद साधारण और लाचार किसान परिवार से आने वाले श्रवण की इस चमत्कारी सफलता (CG Agniveer Shravan) ने यह साबित कर दिया है कि महलों के ठाठ-बाट ही नहीं, बल्कि झोपड़ी का पसीना भी देश की सरहद की रक्षा करने का माद्दा रखता है। इस वक्त पूरे केशकाल और बड़ेराजपुर क्षेत्र में आतिशबाजी और मिठाइयों का दौर चल रहा है, क्योंकि गांव की पगडंडियों से निकला एक लड़का अब देश का गौरव बनने जा रहा है।
दरअसल, यह कहानी केवल एक सरकारी नौकरी मिलने की नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बेहद भावुक, आक्रामक और कड़ा सस्पेंस छुपा हुआ है, जिसने इस युवा को बार-बार टूटने की कगार पर ला खड़ा किया था। श्रवण ने साल 2022 में पहली बार भारतीय सेना की वर्दी पहनने का एक बड़ा सपना अपनी इन आंखों में संजोया था। गांव के सरकारी स्कूल से 12वीं तक की पढ़ाई पूरी करने वाले इस युवा के पास न तो किसी बड़े कोचिंग सेंटर की फीस भरने के पैसे थे और न ही डाइट के लिए महंगे सप्लीमेंट्स। इस घोर आर्थिक नुकसान (CG Agniveer Shravan) और अभावों के बीच, जब साल 2024 में उसे पहली बार सेना की भर्ती परीक्षा में बैठने का मौका मिला, तो किस्मत ने दगा दे दिया और वह अंतिम मेरिट सूची में महज कुछ अंकों से बाहर हो गया। इस करारी हार के बाद पूरा परिवार गहरे सन्नाटे और निराशा में डूब गया था।
जब टूट गया था सब्र का बांध
इस पूरे संघर्ष का सबसे कड़ा और आंखों को भिगो देने वाला सस्पेंस यह है कि पहली असफलता के बाद समाज के तानों और गरीबी के ढर्रे में घिरे श्रवण का हौसला पूरी तरह डगमगा गया था। लेकिन, अपनी मां कौशिल्या मरकाम के पसीने से भीगे फटे आंचल और पिता बालसिंह मरकाम की लाचारी को देखकर इस युवा ने हार मानने के बजाय अपने भीतर एक आक्रामक जिद पाल ली। उसने अपने अभ्यास के ढर्रे में एक बड़ा और कड़ा बदलाव (CG Agniveer Shravan) किया। कड़ाके की ठंड हो या मूसलाधार बारिश, सुबह चार बजे उठकर पत्थरों और कंकड़ों से भरी गांव की सड़कों पर नंगे पैर दौड़ना उसकी दिनचर्या बन गया।
साल 2025 में जब जगदलपुर के मैदान पर बस्तर संभाग की विशाल सेना भर्ती रैली आयोजित हुई, तो श्रवण ने अपनी पिछली गलतियों से सबक लेते हुए मैदान पर एक कड़ा नियम (CG Agniveer Shravan) लागू किया और दौड़ से लेकर फिजिकल के सारे कड़े मापदंडों को रिकॉर्ड समय में पूरा कर लिया। जब लिखित परीक्षा के बाद अंतिम चयन सूची जारी हुई और उसमें ‘श्रवण कुमार मरकाम’ का नाम सुनहरे अक्षरों में चमका, तो डीहीपारा गांव की मिट्टी मानो चहक उठी। बूढ़े माता-पिता ने जब अपने लाडले को गले लगाया, तो अस्पताल और खेतों की सारी थकान आंसुओं के रास्ते बह गई।
सरपंच सहित पूरे वनांचल ने सिर आंखों पर बिठाया
श्रवण मरकाम ने अपनी इस अभूतपूर्व और ऐतिहासिक सफलता का पूरा श्रेय अपने माता-पिता के आशीर्वाद, मामा सुग्रीव वट्टी के मार्गदर्शन, अपने गुरुजनों और गांव के उन शुभचिंतकों को दिया है जिन्होंने बुरे वक्त में उसकी हिम्मत टूटने नहीं दी। फौजी की वर्दी पाने वाले इस जांबाज ने रोते हुए कहा कि, “अगर आपका लक्ष्य पहाड़ों की तरह अचल हो और मेहनत में रत्ती भर भी खोट न हो, तो किस्मत की हर एक बंदिश को हमारी कदमों की गति (CG Agniveer Shravan) के आगे झुकना ही पड़ता है।”
इस ऐतिहासिक गौरव के क्षण पर हरवेल के सरपंच महेश नेताम सहित क्षेत्र के तमाम जनप्रतिनिधियों ने श्रवण के घर पहुंचकर उसका भव्य स्वागत किया। इस भावुक पल का गवाह बनने के लिए बड़े पापा हीरासिंह मरकाम, राजन्तिन मरकाम, गोपी मरकाम, सोनारी मरकाम, मलसाय मरकाम, गर्जन मंडावी, सुखदास नेताम, अमृत मंडावी, रमेश मंडावी और रघुनाथ मरकाम सहित सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे। बहरहाल, डीहीपारा के इस लाल ने यह तो साफ कर दिया है कि बस्तर के जंगलों में केवल बंदूकों की गूंज ही नहीं, बल्कि देश भक्ति के तरानों का सस्पेंस भी धड़कता है, जो आने वाली पीढ़ियों को सेना में जाने के लिए प्रेरित करता रहेगा।




