सीजी भास्कर, 01 जून : छत्तीसगढ़ के ऊर्जाधानी कोरबा जिले के जंगलों में एक बेहद हिंसक वन्यप्राणी (Korba Wildlife Terror) की आमद से ग्रामीण अंचलों में भारी दहशत और खौफ का माहौल बना हुआ है। पिछले महज दो दिनों के भीतर इस अज्ञात शिकारी ने अलग-अलग वन परिक्षेत्रों में कड़ाई से धावा बोलते हुए एक बैल और एक भारी-भरकम भैंस को अपना निवाला बना डाला है। इस खूनी वारदात के बाद से जहां ग्रामीण खौफ के साये में जी रहे हैं, वहीं वन विभाग का अमला भी पूरी तरह अलर्ट मोड पर आ गया है। हमलावर वन्यप्राणी की सटीक पहचान करने और मामले का सस्पेंस खत्म करने के लिए डीएफओ प्रेमलता यादव के कड़े निर्देश पर प्रभावित जंगलों और संवेदनशील इलाकों में आधुनिक थर्मल कैमरे इंस्टॉल कर दिए गए हैं।
दरअसल, शिकार की पहली खौफनाक घटना (Korba Wildlife Terror) 27 मई को पसरखेत वन परिक्षेत्र के कोलगा परिसर में दर्ज की गई। यहाँ के कर्रानारा बस्ती के रहने वाले आमासो उरांव का बैल रोजाना की तरह सुबह चरने के लिए जंगल गया हुआ था, लेकिन देर शाम तक घर वापस नहीं लौटा। परिजनों ने जब कड़ाई से तलाश शुरू की, तो कटंग नाला के पास बैल का क्षत-विक्षत शव बरामद हुआ, जिसके शरीर पर किसी बड़े हिंसक वन्यप्राणी के दांतों और पंजों के गहरे निशान थे। वन अमले ने मौके पर पहुंचकर जब प्रारंभिक जांच की, तो वहां मिले पगचिह्नों (footprints) के आधार पर पहली नजर में तेंदुए के हमले की आशंका जताई गई।
अभी इस घटना (Korba Wildlife Terror) का सस्पेंस सुलझा भी नहीं था कि ठीक तीन दिन बाद 30 मई को कोरबा वन परिक्षेत्र के कोरकोमा सर्किल में दूसरा कड़ा हमला हो गया। यहाँ दुहन सिंह राठिया की पालतू भैंस जंगल से लापता हो गई और खोजबीन के दौरान फिटकपारा के पास एक राइस मिल से कुछ ही दूरी पर स्थित गहरी खाई में उसकी लाश मिली। भैंस के शरीर पर भी वन्यजीव के जानलेवा हमले के कड़े सबूत मिले हैं। लगातार दो बड़े मवेशियों के कत्ल ने वन विभाग के आला अधिकारियों की नींद उड़ा दी है।
इस कूटनीतिक शिकार के बाद अब ग्रामीणों के बीच इस बात को लेकर भारी चर्चा और कौतूहल है कि हमलावर आखिर कौन है? कई तजुर्बेकार ग्रामीणों का कड़े तेवर में कहना है कि यह कोई आम तेंदुआ नहीं बल्कि आदमखोर बाघ हो सकता है, क्योंकि तेंदुआ आमतौर पर बैल और भैंस जैसे भारी-भरकम मवेशियों पर लगातार हमला करने से बचता है। हालांकि, वन विभाग का कहना है कि जब तक थर्मल कैमरों में उस वन्यप्राणी की लाइव तस्वीरें कैद नहीं हो जातीं, तब तक किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
इस कूटनीतिक दहशत का सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है; ग्रामीण अब तेंदूपत्ता और अन्य वनोपज का संग्रहण करने के लिए घने जंगलों के भीतर कदम रखने से कड़ाई से कतरा रहे हैं। इधर, वन विभाग ने मुस्तैदी दिखाते हुए मृत मवेशियों का डॉक्टरों से पोस्टमार्टम कराकर पीड़ित पशुपालकों को कड़ाई से मुआवजा राशि देने की प्रक्रिया पूरी कर ली है। एसडीओ दक्षिण सूर्यकांत सोनी और एसडीओ उत्तर के संयुक्त मार्गदर्शन में वनकर्मी लगातार कैमरों की कूटनीतिक निगरानी और जंगलों में गश्त कर रहे हैं ताकि ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।




