सीजी भास्कर, 19 जून : छत्तीसगढ़ के न्यायधानी बिलासपुर जिले के आदिवासी बाहुल्य कोटा ब्लॉक के ग्राम अमाली में प्रस्तावित कोल वाशरी (Bilaspur Coal Washery Protest) को लेकर जल, जंगल, जमीन की लड़ाई एक बार फिर सड़क पर आ गई है। मेसर्स विराज अर्थ फ्यूजन प्राइवेट लिमिटेड द्वारा शुरू की जा रही इस परियोजना के खिलाफ अमाली सहित आसपास के दर्जनों गांवों के ग्रामीणों ने मोर्चा खोल दिया है। पूर्व में कलेक्ट्रेट का घेराव कर जनसुनवाई रुकवा चुके उग्र ग्रामीणों का आक्रोश आज (19 जून, शुक्रवार) होने वाली दोबारा जनसुनवाई को लेकर और तेज हो गया है। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि यह पूरा इलाका संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून (PESA Act) के दायरे में आता है, इसलिए बिना ग्रामसभा की मर्जी के यहाँ जबरन कोल वाशरी खोलने की कोई भी कोशिश कानूनन गलत है।
इतिहास खुद को दोहरा रहा: एक साल पहले भी रोकना पड़ा था प्रशासन को कदम
यह पूरा विवाद पिछले काफी समय से सुलग रहा है। इसे समझने के लिए परियोजना के फ्लैशबैक में जाना जरूरी है
दिसंबर 2025 का उग्र आंदोलन: इस कोल वाशरी को पर्यावरणीय मंजूरी दिलाने के लिए प्रशासन ने सबसे पहले 22 दिसंबर 2025 को जनसुनवाई (Public Hearing) की तारीख तय की थी। इसकी भनक लगते ही सैकड़ों ग्रामीणों ने बिलासपुर कलेक्ट्रेट का घेराव कर दिया था। कलेक्ट्रेट गेट के सामने ही ग्रामीण धरने पर बैठ गए और जमकर नारेबाजी की, जिसके कारण बैकफुट पर आए प्रशासन को जनसुनवाई स्थगित करनी पड़ी थी।
खेती की जमीन पर औद्योगिक खेल: ग्रामीणों का मुख्य आरोप है कि कोल वाशरी के लिए जो जमीनें खरीदी-बेची गई हैं, वे मूल रूप से उपजाऊ कृषि भूमि (Agricultural Land) हैं। भू-माफियाओं और कंपनी ने इसे खेती के नाम पर खरीदा था, लेकिन अब नियमों को ताक पर रखकर बिना लैंड-यूज (भूमि उपयोग परिवर्तन) के नियमों का पालन किए यहाँ औद्योगिक सेटअप लगाया जा रहा है।
पेसा एक्ट और ग्रामसभा के अधिकारों पर डाका डालने का आरोप
ग्रामीणों ने प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपे अपने नए ज्ञापन में देश के कानून का हवाला देते हुए तीखे सवाल दागे हैं। ग्रामीणों का साफ कहना है कि ग्राम अमाली एक ट्राइबल नोटिफाइड एरिया है। पेसा एक्ट के तहत किसी भी प्रकार की औद्योगिक परियोजना या खनन गतिविधि के लिए स्थानीय ग्रामसभा की लिखित सहमति और अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) मिलना अनिवार्य है। प्रशासन ने बिना ग्रामसभा को विश्वास में लिए पर्यावरण संरक्षण मंडल की हरी झंडी के आधार पर जनसुनवाई की तारीख दोबारा 19 जून कैसे तय कर दी? ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि वे किसी भी कीमत पर वाशरी शुरू नहीं होने देंगे, चाहे इसके लिए उन्हें जेल ही क्यों न जाना पड़े।
अचानकमार टाइगर रिजर्व’ पर भी मंडराया खतरा
ग्रामीणों ने जनसुनवाई निरस्त करने के पीछे जो तार्किक और पर्यावरणीय आपत्तियां दर्ज कराई हैं, वे बेहद गंभीर हैं:
शासकीय कॉलेज पर संकट: प्रस्तावित कोल वाशरी की बाउंड्री से महज 200 मीटर की दूरी पर शासकीय महाविद्यालय (Government College) संचालित है, जहाँ क्षेत्र के सैकड़ों छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। वाशरी शुरू होते ही उड़ने वाली कोयले की जहरीली धूल (Coal Dust) और 24 घंटे होने वाली भारी ट्रकों की आवाजाही से शिक्षण व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी और छात्रों के फेफड़े खराब होंगे।
अचानकमार वन्यजीव क्षेत्र प्रभावित: हवाई दूरी के लिहाज से ‘आचानकमार टाइगर रिजर्व’ (Achanakmar Tiger Reserve) का संरक्षित क्षेत्र इस प्रस्तावित साइट से मात्र 10 किलोमीटर दूर है। वाशरी से होने वाला ध्वनि और वायु प्रदूषण वन्यजीवों के प्राकृतिक पर्यावास को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा।
खेती और स्वास्थ्य तबाह: वाशरी से निकलने वाले ब्लैक वाटर (प्रदूषित पानी) से आसपास के जलस्रोत और उपजाऊ खेत बंजर हो जाएंगे, जिससे किसानों के सामने भुखमरी की स्थिति आ जाएगी।
बाहरी लोगों के आने से बिगड़ेगी कानून-व्यवस्था
अमाली के स्थानीय ग्रामीणों ने एक सामाजिक चिंता भी जाहिर की है। उनका कहना है कि इस शांत वनांचल क्षेत्र में हैवी इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट आने से बाहरी राज्यों और जिलों के मजदूरों व असामाजिक तत्वों की आवाजाही अचानक बढ़ जाएगी। इससे क्षेत्र की पुरातन जनजातीय संस्कृति, सामाजिक ताना-बाना और कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की पूरी आशंका है। ग्रामीणों ने बिलासपुर जिला प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि आज 19 जून को होने वाली जनसुनवाई को तुरंत रद्द घोषित किया जाए और पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए।





