सीजी भास्कर, 22 जून। वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में हाई कोर्ट की टिप्पणी ने कानूनी हलकों में चर्चा (Maintenance Case) बढ़ा दी है। अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि अंतरिम गुजारा भत्ता देने का उद्देश्य उन परिस्थितियों में तत्काल राहत प्रदान करना होता है, जहां किसी पक्ष को मुकदमे के दौरान आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा हो। ऐसे में समय और परिस्थितियों का आकलन भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह देखा कि विवाद के बावजूद लंबे समय तक किसी प्रकार की अंतरिम सहायता की मांग नहीं की गई थी। इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए अदालत ने मामले में विस्तृत विचार किया और परिवार न्यायालय के आदेश को उचित माना।
बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक महिला द्वारा दायर अंतरिम भरण पोषण याचिका को खारिज किए जाने के परिवार न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि विवाह के बाद अलग रहने के लगभग 10 वर्ष बाद अंतरिम गुजारा भत्ते की मांग करना यह संकेत देता है कि तत्काल आर्थिक संकट की स्थिति स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हो सकी है।
वर्ष 2015 में हुआ था विवाह Maintenance Case
मामले के अनुसार संगीता साहू का विवाह 10 जून 2015 को दीपक साहू के साथ हुआ था। महिला का आरोप था कि विवाह के कुछ समय बाद उसे शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा, जिसके बाद वह अपने मायके में रहने लगी।
परिवार न्यायालय में लगाया था आवेदन
कई वर्षों तक अलग रहने के बाद महिला ने परिवार न्यायालय में अंतरिम गुजारा भत्ते के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। उसने मुकदमे के दौरान आर्थिक सहायता दिए जाने की मांग की थी।
पति ने किया विरोध
पति की ओर से आवेदन का विरोध करते हुए कहा गया कि पत्नी अपनी इच्छा से मायके (Maintenance Case) में रह रही है। साथ ही अन्य तथ्यों का भी उल्लेख करते हुए अंतरिम भरण पोषण की मांग का विरोध किया गया।
परिवार न्यायालय ने किया था इन्कार
परिवार न्यायालय ने 10 अप्रैल 2026 को महिला का आवेदन खारिज कर दिया था। अदालत ने माना कि वर्ष 2015 से अलग रहने की स्थिति में तत्काल आर्थिक आपातकाल या तात्कालिक वित्तीय संकट का पर्याप्त आधार सामने नहीं आया है।
हाई कोर्ट ने माना फैसला सही
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि अंतरिम भरण पोषण का उद्देश्य मुकदमे के दौरान आर्थिक रूप से असहाय पक्ष को तत्काल सहायता उपलब्ध कराना होता है। अदालत ने पाया कि लंबे अंतराल के बाद दायर आवेदन में तत्काल वित्तीय संकट का पर्याप्त आधार प्रदर्शित नहीं हुआ।
तीन माह में सुनवाई पूरी करने के निर्देश
हाई कोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप से इन्कार करते हुए याचिका खारिज (Maintenance Case) कर दी। साथ ही निर्देश दिया कि यदि कोई कानूनी बाधा न हो तो मुख्य प्रकरण की सुनवाई यथासंभव तीन माह के भीतर पूरी की जाए।





