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Home » Caste Certificate : वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद भी क्यों नहीं मिला जाति प्रमाणपत्र, अदालत ने बताई वजह

Caste Certificate : वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद भी क्यों नहीं मिला जाति प्रमाणपत्र, अदालत ने बताई वजह

By Newsdesk Admin
22/06/2026
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सीजी भास्कर, 22 जून। जाति प्रमाणपत्र से जुड़े एक मामले में हाई कोर्ट का फैसला चर्चा का विषय बन गया है। कई वर्षों से प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर चल रही प्रक्रिया के बाद अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल दावे या कुछ दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जा सकता। निर्धारित नियमों और आवश्यक प्रमाणों को पूरा करना अनिवार्य है।

Contents
  • वर्ष 2019 से चल रहा था मामला
  • अदालत ने क्या पाया
  • दस्तावेजों को बताया था पर्याप्त
  • आरक्षण लाभ के लिए जरूरी हैं नियम
  • याचिका हुई खारिज

मामले में आवेदक ने अपने सामाजिक दर्जे को साबित करने के लिए विभिन्न दस्तावेज प्रस्तुत किए थे, लेकिन अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और वैधानिक प्रावधानों का परीक्षण करते हुए अलग निष्कर्ष निकाला। फैसले के बाद जाति प्रमाणपत्र संबंधी प्रक्रियाओं को लेकर भी महत्वपूर्ण संदेश गया है।

बिलासपुर हाई कोर्ट ने राजनांदगांव जिले की किरण मेश्राम की याचिका खारिज करते हुए अनुसूचित जाति वर्ग के महार जाति प्रमाणपत्र की मांग स्वीकार करने से इन्कार कर दिया है। अदालत ने कहा कि सामाजिक स्थिति प्रमाणपत्र जारी करने के लिए निर्धारित वैधानिक शर्तों का पालन आवश्यक है और दावा करने वाले व्यक्ति पर ही आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी होती है।

वर्ष 2019 से चल रहा था मामला

याचिकाकर्ता ने वर्ष 2019 में स्थायी जाति प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन किया था। उनका दावा था कि वे महार समुदाय से संबंधित हैं और इसके समर्थन में आवश्यक दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए हैं।

प्रशासनिक स्तर पर विभिन्न चरणों में मामले की समीक्षा हुई। कुछ आदेशों के बाद प्रकरण पुनर्विचार के लिए संबंधित अधिकारियों के पास भी भेजा गया, लेकिन आवेदन को स्वीकार नहीं किया गया।

अदालत ने क्या पाया

न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि याचिकाकर्ता अपने पूर्वजों के वर्ष 1950 से पहले छत्तीसगढ़ की वर्तमान भौगोलिक सीमा अथवा डोंगरगढ़ क्षेत्र में निवास का प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकीं।

अदालत ने माना कि यह शर्त संबंधित नियमों के तहत आवश्यक है और इसके अभाव में प्रमाणपत्र जारी करने से इन्कार करना गलत नहीं माना जा सकता।

दस्तावेजों को बताया था पर्याप्त

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उनके पिता के शैक्षणिक अभिलेख, पारिवारिक दस्तावेज और पूर्व में जारी कुछ प्रमाणपत्र उनके सामाजिक दर्जे को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं।

हालांकि अदालत ने कहा कि वैधानिक प्रक्रिया के तहत आवश्यक सभी शर्तों का पालन और निर्धारित प्रकार के प्रमाण प्रस्तुत करना जरूरी है।

आरक्षण लाभ के लिए जरूरी हैं नियम

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सामाजिक स्थिति प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया अत्यंत संवेदनशील है। आरक्षण और उससे जुड़े संवैधानिक लाभ केवल वैध और निर्धारित दस्तावेजों के आधार पर ही दिए जा सकते हैं।

याचिका हुई खारिज

सभी तथ्यों और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रमाणपत्र जारी करने से इन्कार करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई।

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