सीजी भास्कर, 13 अगस्त। कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की पारंपरिक चाय पार्टी में शामिल नहीं होने के पीछे अपनी वजह बताई। पार्टी का कहना है कि स्पीकर की ओर से कस्टमरी स्पीच नहीं दी गई और न ही यह बताया गया कि संसद का कामकाज कैसा रहा। इसी कारण विपक्ष ने चाय पार्टी का बहिष्कार करने का फैसला किया। इससे पहले कार्यक्रम में प्रियंका गांधी को भेजने की तैयारी थी, जबकि सोनिया गांधी और खरगे के भी इसमें शामिल होने की बात थी। (Opposition Tea Party Boycott)
वहीं, विपक्ष की ओर से सिर्फ डीएमके का चाय पार्टी में पहुंचना राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। डीएमके सांसद कनिमोझी ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बातचीत भी की। इसे सियासी तौर पर अहम कदम माना जा रहा है।
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कांग्रेस से दूरी के बाद DMK के रुख पर चर्चा : Opposition Tea Party Boycott
कनिमोझी के चाय पार्टी में शामिल होने के पीछे कांग्रेस के साथ गठबंधन टूटने, दक्षिण भारत के प्रतिनिधित्व और परिसीमन के मुद्दे को अहम माना जा रहा है। डीएमके ने हाल ही में कांग्रेस के साथ गठबंधन खत्म किया है।
कनिमोझी की मौजूदगी को इस संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है कि डीएमके भले ही NDA का हिस्सा न हो, लेकिन वह परिसीमन का पूरी तरह विरोध करने के पक्ष में भी नहीं है।
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विपक्ष के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
पिछले साल मानसून सत्र खत्म होने के बाद जब विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष की पारंपरिक चाय पार्टी का बहिष्कार किया था, तब डीएमके भी विपक्ष के साथ खड़ा था। उस समय डीएमके का कोई नेता चाय पार्टी में शामिल नहीं हुआ था।
हालांकि इस बार तस्वीर अलग नजर आई। कनिमोझी के चाय पार्टी में पहुंचने के बाद सियासी गलियारों में डीएमके के अगले कदम को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। राजनीतिक जानकार इसे विपक्ष से डीएमके की दूरी और सत्ता पक्ष के करीब आने के संकेत के तौर पर देख रहे हैं।
यह स्थिति सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बल्कि पूरे विपक्ष के लिए चिंता का विषय मानी जा रही है। अगर डीएमके NDA को समर्थन देता है तो विपक्षी एकता पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।
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परिसीमन विधेयक के लिए अहम हो सकती है DMK की भूमिका : Opposition Tea Party Boycott
मोदी सरकार अगर डीएमके को अपने पक्ष में बनाए रखने में सफल रहती है, तो आने वाले समय में परिसीमन विधेयक को आगे बढ़ाने की राह आसान हो सकती है। डीएमके के पास लोकसभा में 22 सांसद हैं, इसलिए उसका समर्थन महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
डीएमके के विरोध के चलते ही सरकार अप्रैल में आयोजित विशेष सत्र के दौरान इस विधेयक को पारित नहीं करा सकी थी। ऐसे में अब कनिमोझी का लोकसभा अध्यक्ष की चाय पार्टी में शामिल होना कई सियासी संकेत दे रहा है।




