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15 दस्तावेज भी नहीं बचा सके नागरिकता का दावा, जानिए फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल कैसे करता है फैसला

By Newsdesk Admin
04/07/2026
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असम से सामने आए एक मामले ने नागरिकता साबित करने की प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक व्यक्ति ने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए 15 अलग-अलग दस्तावेज अदालत में पेश किए, लेकिन इसके बावजूद उसका दावा स्वीकार नहीं किया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल दस्तावेजों की संख्या पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उनका कानूनी रूप से मान्य होना और पूर्वजों से स्पष्ट संबंध स्थापित करना भी आवश्यक है।

मामला असम के एक दिहाड़ी मजदूर से जुड़ा है, जिसकी पहचान कानूनी कारणों से सार्वजनिक नहीं की गई है। उसने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के समक्ष 1951 की एनआरसी, विभिन्न वर्षों की मतदाता सूचियां, जमीन के दस्तावेज, स्कूल प्रमाणपत्र, पैन कार्ड और वोटर आईडी सहित कुल 15 दस्तावेज प्रस्तुत किए। साथ ही उसने दावा किया कि नदी कटाव के कारण उसका परिवार अलग-अलग गांवों में बसता रहा, इसलिए उनके रिकॉर्ड विभिन्न स्थानों पर दर्ज हैं। उसके पिता ने भी मौखिक गवाही दी।

हालांकि, अदालत ने कहा कि प्रस्तुत दस्तावेज नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। न्यायालय के अनुसार, दस्तावेजों का कानून के अनुरूप प्रमाणित होना, उनमें किसी प्रकार का विरोधाभास न होना और उनसे व्यक्ति का अपने पूर्वजों से स्पष्ट संबंध स्थापित होना जरूरी है।

अदालत ने 1951 की एनआरसी की कंप्यूटरीकृत प्रति को भारतीय साक्ष्य कानून के अनुरूप प्रमाणित न होने के कारण स्वीकार नहीं किया। स्कूल प्रमाणपत्र को भी पर्याप्त नहीं माना गया क्योंकि स्कूल के प्रधानाचार्य और प्रवेश रजिस्टर को साक्ष्य के रूप में पेश नहीं किया गया था। 1973 के भूमि दस्तावेज से भी उत्तराधिकार की स्पष्ट कड़ी स्थापित नहीं हो सकी।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पैन कार्ड और वोटर आईडी पहचान संबंधी दस्तावेज हैं, लेकिन इन्हें भारतीय नागरिकता का कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता। वहीं, विभिन्न वर्षों की मतदाता सूचियों में परिवार के सदस्यों की उम्र और निवास स्थान से जुड़े विरोधाभास भी पाए गए, जिससे नागरिकता का दावा कमजोर हो गया।

फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल केंद्र सरकार द्वारा विदेशी अधिनियम, 1946 के तहत गठित एक अर्ध-न्यायिक संस्था है, जिसका कार्य यह तय करना है कि संबंधित व्यक्ति भारतीय नागरिक है या विदेशी। जब किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह होता है, तो मामला ट्रिब्यूनल के पास भेजा जाता है। ट्रिब्यूनल संबंधित व्यक्ति को नोटिस जारी कर दस्तावेज और अन्य साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर देता है तथा आवश्यक होने पर गवाहों के बयान भी दर्ज करता है।

यदि प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त और कानूनी रूप से मान्य नहीं पाए जाते, तो ट्रिब्यूनल संबंधित व्यक्ति को विदेशी घोषित कर सकता है। इसके बाद कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाती है।

विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के अनुसार, नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति की होती है। ऐसे मामलों में सरकार नहीं, बल्कि संबंधित व्यक्ति को यह साबित करना पड़ता है कि वह भारतीय नागरिक है। इसी कारण ट्रिब्यूनल केवल दस्तावेजों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी वैधता, विश्वसनीयता और व्यक्ति के पूर्वजों से उनके संबंध की भी विस्तार से जांच करता है।

असम पुलिस का बॉर्डर संगठन संदिग्ध नागरिकता वाले मामलों की प्रारंभिक जांच करता है और आवश्यक साक्ष्य जुटाकर उन्हें फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के समक्ष भेजता है। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) से बाहर हुए लोगों को भी अपनी नागरिकता साबित करने के लिए ट्रिब्यूनल में अपील करने का अधिकार प्राप्त है।

भारतीय संविधान और नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार, देश में नागरिकता जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीकरण और नए क्षेत्र के भारत में शामिल होने जैसी परिस्थितियों के आधार पर प्रदान की जाती है। किसी भी विवाद की स्थिति में अदालत या फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल यह जांच करता है कि प्रस्तुत दस्तावेज कानूनी रूप से मान्य हैं या नहीं और क्या उनसे व्यक्ति का अपने परिवार एवं पूर्वजों से स्पष्ट संबंध स्थापित होता है। इन्हीं आधारों पर नागरिकता संबंधी अंतिम निर्णय लिया जाता है।

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