सीजी भास्कर, 14 जुलाई : जशपुर जिले में पारंपरिक बांस हस्तशिल्प को राष्ट्रीय पहचान दिलाने और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने के लिए जिला प्रशासन ने ‘जशक्राफ्ट’ (Jashcraft) ब्रांड को मजबूत करने की दिशा में नई पहल शुरू की है। इसके तहत विकासखंड जशपुर की ग्राम पंचायत झोलांगा में 29 जून से 29 जुलाई तक एक माह का आवासीय बांस हस्तशिल्प प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया जा रहा है। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य पारंपरिक कला को आधुनिक बाजार से जोड़कर कारीगरों की आमदनी बढ़ाना है।
यह प्रशिक्षण कलेक्टर रोहित व्यास के नेतृत्व और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अभिषेक कुमार के मार्गदर्शन में जिला पंचायत तथा राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के माध्यम से संचालित किया जा रहा है। अभियान के तहत करीब 150 परिवारों की आजीविका मजबूत करने का लक्ष्य रखा गया है। फिलहाल पहले चरण में 46 महिलाओं को आवासीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
गुजरात के विशेषज्ञ दे रहे आधुनिक प्रशिक्षण
जशक्राफ्ट (Jashcraft) प्रशिक्षण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रतिभागियों को आधुनिक मशीनों, नए डिजाइनों और बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद तैयार करना सिखाया जा रहा है। इसके लिए गुजरात के सूरत से विशेषज्ञ प्रशिक्षकों को बुलाया गया है। प्रशिक्षण में फैंसी ट्रे, गुलदस्ते, चटाई, सजावटी टोकरियां, माचिया, फर्नीचर, सोफा, पलंग और अन्य आकर्षक बांस उत्पाद बनाने की तकनीक सिखाई जा रही है।
250 परिवारों को मिलेगा सीधा लाभ
जशपुर और मनोरा विकासखंड में करीब 250 परिवार वर्षों से बांस हस्तशिल्प के जरिए आजीविका चला रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या में बिहान स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं भी शामिल हैं। जिला प्रशासन इन समूहों को चक्रीय निधि, सामुदायिक निवेश निधि (CIF), बैंक लिंकेज और मुद्रा ऋण जैसी वित्तीय सुविधाओं से जोड़कर उनके व्यवसाय को मजबूत कर रहा है।
राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचेगा ‘जशक्राफ्ट’
जिला प्रशासन जशक्राफ्ट ब्रांड के तहत तैयार उत्पादों को रूरल मार्ट, राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियों के साथ देश के बड़े बाजारों तक पहुंचाने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए डिजाइन और मार्केटिंग विशेषज्ञों की सेवाएं भी ली जा रही हैं, ताकि स्थानीय कारीगरों को उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य मिल सके।
प्रशासन का लक्ष्य अगले वर्ष तक हस्तशिल्प से जुड़े सभी स्व-सहायता समूहों के सदस्यों को ‘लखपति दीदी’ की श्रेणी में लाना है। अधिकारियों का मानना है कि यह पहल न केवल पारंपरिक बांस शिल्प को नई पहचान देगी, बल्कि महिला सशक्तिकरण, स्थानीय रोजगार और जनजातीय परिवारों की आय बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाएगी।



