सीजी भास्कर, 22 सितंबर। विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं के लिए केंद्रीय नौकरियों में आयु सीमा में छूट की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court on Kashmiri Hindus) ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि यह एक नीतिगत फैसला है और इसमें न्यायपालिका के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।
क्या था मामला?
यह याचिका विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं के संगठन पनुन कश्मीर ट्रस्ट की ओर से दाखिल की गई थी। संगठन ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका में मांग की थी कि केंद्र सरकार की ग्रुप C और D नौकरियों की भर्ती में कश्मीरी हिंदुओं को आयु सीमा में छूट दी जाए।
याचिका में क्या कहा गया?
याचिका में दलील दी गई कि जैसे 1984 के सिख विरोधी दंगों और 2002 के गुजरात (Supreme Court on Kashmiri Hindus) दंगों के पीड़ितों को विशेष छूट दी गई थी, वैसे ही कश्मीरी हिंदुओं को भी राहत मिलनी चाहिए। संगठन का कहना था कि 1990 में घाटी से कश्मीरी हिंदुओं का बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ, जिसके चलते तीन दशकों से अधिक समय तक उनके मौलिक अधिकारों का हनन हुआ।
याचिका में यह भी कहा गया कि विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं की दूसरी पीढ़ी आज भी रोजगार की राह में कठिनाइयों का सामना कर रही है। शरणार्थी शिविरों और अस्थायी बस्तियों में जीवन गुजारने वाले युवाओं को आयु सीमा की बाधा के कारण सरकारी नौकरियों में अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई से इनकार करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा – “हमें इसमें हस्तक्षेप क्यों करना चाहिए? यह पूरी तरह नीति का विषय है।” इसके साथ ही अदालत ने साफ कर दिया कि इस मामले (Supreme Court on Kashmiri Hindus) पर कोई सुनवाई आगे नहीं की जाएगी।





