सीजी भास्कर, 24 सितंबर। कहते हैं “न्याय में देरी, न्याय से इनकार के बराबर है” – छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर (False Accusation Impact) के 83 वर्षीय जागेश्वर प्रसाद अवधिया की जिंदगी इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। 1986 में उन पर ₹100 की रिश्वत लेने का आरोप लगा और देखते ही देखते उनकी नौकरी, परिवार और सम्मान सब कुछ छिन गया। लंबी अदालती लड़ाई के बाद हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया, लेकिन बीते 39 सालों में उनका जीवन पूरी तरह बदल चुका है।
कैसे शुरू हुआ आरोप का खेल
उस वक्त जागेश्वर मध्य प्रदेश स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (False Accusation Impact) के रायपुर दफ्तर में बिल सहायक थे। एक कर्मचारी ने अपने बिल पास कराने का दबाव बनाया, जागेश्वर ने नियमों का हवाला देकर इनकार कर दिया। अगले ही दिन वही कर्मचारी 100 रुपये जबरदस्ती उनकी जेब में डालकर विजिलेंस बुला लाया। इसी आधार पर जागेश्वर को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने बार-बार बेगुनाही की गुहार लगाई, लेकिन न तो परिवार बचा, न करियर।
परिवार टूटा, बच्चों का भविष्य डगमगाया
1988 से 1994 तक जागेश्वर निलंबित रहे। वेतन आधा हो गया और प्रमोशन रुक गया। ढाई हजार रुपये की आमदनी में चार बच्चों का खर्च चलाना नामुमकिन था। पत्नी तनाव (False Accusation Impact) में रही और कुछ साल बाद चल बसी। बेटे नीरज कहते हैं, “स्कूल में हमें रिश्वतखोर का बेटा कहकर चिढ़ाया जाता था, फीस न भर पाने पर कई बार स्कूल से निकाला गया। आज पापा का नाम तो साफ हो गया, लेकिन हमारा बचपन लौट नहीं सकता।”
अदालतों में लंबी लड़ाई
2004 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी करार देकर एक साल जेल और 1,000 रुपये जुर्माना लगाया। लेकिन जागेश्वर ने हार नहीं मानी और हाईकोर्ट (False Accusation Impact) का दरवाजा खटखटाया। जस्टिस बीडी गुरु की बेंच ने कहा कि अभियोजन रिश्वत लेने का ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। गवाह और दस्तावेज पर्याप्त नहीं थे। इस आधार पर ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट गया और आखिरकार जागेश्वर बेगुनाह साबित हुए।
अब सुकून की तलाश
अवधिया पारा के पुश्तैनी घर में फाइलों से भरी आलमारी आज भी उनके संघर्ष की गवाही देती है। जागेश्वर कहते हैं, “न्याय मिला, लेकिन किस कीमत पर? परिवार बिखर गया, करियर खत्म हो गया। अब बस पेंशन और बकाया मिल जाए, ताकि बचे हुए दिन चैन से गुजर सकें।” उनके बेटे नीरज की अपील है कि सरकार मुआवजा दे, ताकि उनके पिता की पीड़ा का कुछ तो हिसाब चुकाया जा सके।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकार कहते हैं कि यह केस न्यायिक देरी की बड़ी मिसाल है। एक झूठा आरोप कैसे पूरी जिंदगी बर्बाद कर सकता है, यह कहानी उसी का दर्दनाक सबूत है। अब सवाल उठता है — क्या ऐसे मामलों में पीड़ितों को मुआवजा और त्वरित न्याय नहीं मिलना चाहिए?



