13 महीने की बच्ची घर पर अकेली, पिता निकला न्याय की राह पर (Disabled Husband Rajasthan Journey)
राजस्थान के जैसलमेर में रहने वाले दिव्यांग अनु रंगा ने वो किया जिसकी मिसाल कम ही देखने को मिलती है। एक पिता, जो खुद चलने में असमर्थ है, अपनी दिव्यांग पत्नी के तबादले के लिए 735 किलोमीटर की (Scooty Journey for Wife Transfer) स्कूटी यात्रा पर निकल पड़ा। घर में 13 महीने की मासूम बेटी ध्रुविका है, जो मां की गोद से दूर है और पिता अपने हक की लड़ाई सड़क पर लड़ रहा है।
Disabled Husband Rajasthan Journey: दिव्यांग दंपती की मजबूरी, 735 किलोमीटर की दूरी का दर्द
अनु रंगा और उनकी पत्नी बीना दोनों ही दिव्यांग हैं। साल 2019 में बीना का चयन तीसरे ग्रेड शिक्षक के रूप में हुआ था और वर्तमान में वह बांसवाड़ा जिले के सेमलिया के सरकारी स्कूल में कार्यरत हैं। यह जगह जैसलमेर से करीब 735 किलोमीटर दूर है। इतनी दूरी ने इस परिवार को तोड़कर रख दिया है। पति जैसलमेर में आरओ प्लांट का बिजनेस संभालता है, जबकि पत्नी अपनी ड्यूटी निभाने बांसवाड़ा में है।
CM से मिलने का संकल्प – जब तक ट्रांसफर नहीं, वापसी नहीं
अनु रंगा ने साफ कहा है कि जब तक उनकी पत्नी का (Teacher Transfer Demand Rajasthan) जैसलमेर में ट्रांसफर नहीं होता, वे घर नहीं लौटेंगे। वे जयपुर में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से मुलाकात कर अपनी पत्नी के तबादले की मांग रखेंगे। उन्होंने कहा, “ये यात्रा सिर्फ मेरा निजी संघर्ष नहीं, सैकड़ों शिक्षकों की आवाज है, जो अपने घरों से दूर हैं।”

Disabled Husband Rajasthan Journey: चार पहिया स्कूटी से शुरू हुई उम्मीद की यात्रा
शुक्रवार 24 अक्टूबर को अनु रंगा अपने दोस्त के साथ चार पहिया स्कूटी पर जयपुर के लिए रवाना हुए। यह यात्रा सिर्फ एक ट्रांसफर की मांग नहीं, बल्कि परिवार की मजबूरी और प्रेम की परीक्षा है। वे जैसलमेर से पोकरण, फलोदी, नागौर होते हुए 26 अक्टूबर तक जयपुर पहुंचेंगे। 27 अक्टूबर को मुख्यमंत्री से मिलने का प्रयास करेंगे।
सरकार की रोक और शिक्षकों का संघर्ष
राज्य में तीसरे ग्रेड शिक्षकों के ट्रांसफर पर रोक लगी हुई है, जिससे हजारों शिक्षक प्रभावित हैं। अनु रंगा का कहना है कि सरकार को यह समझना चाहिए कि “एक शिक्षक भी इंसान है, उसका परिवार है, उसकी भावनाएं हैं।” उन्होंने बताया कि यह मुद्दा सिर्फ एक तबादले का नहीं, बल्कि (Teachers Family Problems) का प्रतीक बन चुका है।
आवाज जो बन गई उम्मीद की किरण
अनु रंगा की यह यात्रा अब सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं रही, बल्कि राजस्थान के उन तमाम शिक्षकों की भावना बन गई है, जो अपने घर और ड्यूटी के बीच फंसे हैं। वे कहते हैं — “अगर मेरी आवाज सीएम तक पहुंच जाए और किसी एक परिवार को भी राहत मिले, तो यही मेरी जीत होगी।”


