सीजी भास्कर, 26 नवंबर। कर्नाटक की राजनीति में कांग्रेस का ज्वालामुखी अब फटने ही वाला है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच का ( Congress Power Tussle ) संघर्ष अब सिर्फ शांत टकराव नहीं रहा, बल्कि खुले विवाद का रूप ले चुका है।
पार्टी को उम्मीद थी कि हाईकमान समय रहते ( Congress High Command Intervention ) फायरब्रिगेड की तरह दखल देगा, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राहुल गांधी इस पूरी सियासी हलचल से गायब हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह संघर्ष केवल वर्तमान स्थिति नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर लंबे समय से चले आ रहे उस राजनीतिक पैटर्न का हिस्सा है, जहां दो बड़े नेता टकराते हैं और संगठन दो हिस्सों में बंट जाता है।
कर्नाटक में कांग्रेस सरकार बने (Karnataka Congress Government Crisis) ढाई साल से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन स्थिरता के बजाय बेचैनी तेजी से बढ़ी है। राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर यह खींचतान कब खत्म होगी। सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच तनाव अब बैकग्राउंड तक सीमित नहीं रहा। हाईकमान की चुप्पी ने हालात को और ज्यादा उलझा दिया है।
चुनाव के समय सत्ता-साझेदारी ( Power Sharing Formula Congress ) का एक फार्मूला बनाने की चर्चा थी। माना गया कि सिद्धारमैया आधा कार्यकाल पूरा करेंगे और फिर डीके शिवकुमार को सीएम की कुर्सी सौंपी जाएगी। हालांकि इसे कभी आधिकारिक रूप से लिखित नहीं किया गया। राजनीति में कुछ बातें कागज पर नहीं, भरोसे पर चलती हैं—और आज वही भरोसा डगमगाता दिखाई दे रहा है।
यह स्थिति राजस्थान में अशोक गहलोत–सचिन पायलट विवाद और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल–टीएस सिंहदेव विवाद जैसी है, जहां पावर-शेयरिंग का वादा कभी लागू नहीं हुआ। जिस नेता के हाथ में सत्ता आई, उसने फिर कुर्सी छोड़ी ही नहीं। जबकि ढाई-ढाई साल की चर्चाएं आम थीं।
किसका पलड़ा भारी
कर्नाटक में सिद्धारमैया प्रशासनिक अनुभव और जनाधार के कारण मजबूत हैं। दूसरी तरफ डीके शिवकुमार संगठन, संसाधन और वोक्कालिगा समाज में मजबूत पकड़ के कारण भारी हैं। शिवकुमार ने महाराष्ट्र, हिमाचल, गोवा जैसे राज्यों के संकटों में ( Congress Troubleshooter ) ट्रबलशूटर की भूमिका भी निभाई है। यही वजह है कि दोनों नेता समान रूप से ताकतवर हैं जो हाईकमान के लिए सबसे बड़ी मुश्किल बन गया है।
Karnataka Congress Crisis हाईकमान क्या कर रहा है
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने साफ कहा निर्णय हाईकमान करेगा”। पर सवाल ये है कि हाईकमान है कहां? दिल्ली में शिवकुमार समर्थक विधायक केसी वेणुगोपाल से मिलने इंतजार करते रहे, पर वह केरल से लौटे ही नहीं। हाईकमान की यही लंबी चुप्पी अब सबसे बड़ी समस्या बन गई है। अगर हाईकमान फैसला कर दे कि सिद्धारमैया पूरे 5 साल CM रहेंगे, तो शिवकुमार गुट बगावती हो सकता है।
अगर शिवकुमार को CM बनाया जाता है, तो सिद्धारमैया गुट नाखुश होगा। दोनों ही स्थितियों में पार्टी को बड़ा नुकसान होगा जैसा राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुआ। कर्नाटक दक्षिण भारत में कांग्रेस का मजबूत किला है ( Southern Politics ) और इसे खतरे में डालने का जोखिम हाईकमान बिल्कुल नहीं लेना चाहता। इसलिए निर्णय टलता जा रहा है।
क्या संकट सुलझेगा
फिलहाल इसके कोई संकेत नहीं हैं कि जल्दी कोई फैसला होगा। कांग्रेस नेतृत्व को लग रहा है कि समय के साथ स्थिति शांत हो जाएगी, या कोई ऐसा मौका आएगा जहाँ नेतृत्व परिवर्तन आसान हो जाए। कर्नाटक का यह संकट केवल CM की कुर्सी की लड़ाई नहीं, बल्कि कांग्रेस हाईकमान की शैली, उसकी चुप्पी और बार-बार दोहराए जाने वाले पैटर्न का प्रतिबिंब है। जब विवाद लंबा खिंचता है, तो वही चुप्पी अस्थिरता का कारण बनती है और कर्नाटक में अभी यही हो रहा है।




