सीजी भास्कर, 03 सितंबर। इंदौर में बहुचर्चित फर्जी फैसला कांड एक बार फिर सुर्खियों में है। आरक्षण को लेकर ब्राह्मण समाज की बेटियों पर विवादित टिप्पणी करने वाले आईएएस संतोष वर्मा को कथित रूप से गलत तरीके से बरी किए जाने के मामले में अब वही जज जांच के घेरे में आ गए हैं जिन्होंने फैसला (IAS Santosh Verma bail) सुनाया था। निलंबित हो चुके तत्कालीन स्पेशल जज विजेंद्रसिंह रावत ने मंगलवार को सेशन कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर कर दी है, जिससे पूरा मामला नए मोड़ पर पहुंच गया है।
पुलिस ने साफ कर दिया है कि वह जमानत का सख्त विरोध करेगी। जांच कर रही एजेंसियों के अनुसार, रावत को इस प्रकरण में प्रमुख संदेही माना जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि यही जज लगभग 20 दिन पहले ही निलंबित किए गए थे और इस पूरे मामले में आईएएस संतोष वर्मा पहले से ही सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत पर बाहर हैं।
जांच की आहट मिलते ही कोर्ट में पहुंची जमानत याचिका
जानकारी के अनुसार, जांच अधिकारियों ने हाई कोर्ट से रावत से पूछताछ की अनुमति मांगी थी, जिसे मंजूर कर लिया गया। जैसे ही इस आदेश की भनक लगी, रावत ने तत्काल सेशन कोर्ट में अग्रिम जमानत (IAS Santosh Verma bail) की अर्जी लगा दी। उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को गलत बताते हुए खुद को इस मामले में ‘फरियादी’ बताया है।
दूसरी ओर, पुलिस का कहना है कि जांच के दौरान कई तकनीकी और दस्तावेजी सबूत मिले हैं, जिनकी गांठ रावत के पास मौजूद मोबाइल और डिजिटल उपकरणों तक जाती है।
मोबाइल और हार्ड डिस्क में छुपे राज—चार साल पुरानी जांच में हुए अहम खुलासे
जांच टीम ने लगभग चार साल पहले ही रावत के कोर्ट से एक कंप्यूटर जब्त किया था, जिसकी हार्ड डिस्क रिकवर कर फर्जी फैसले की कॉपी बरामद की गई। इसके बाद टाइपिस्ट नीतू सिंह से एक पेनड्राइव जब्त की गई, जिसे भी रिकवर कराया गया।
एसआईटी ने रावत से उनका मोबाइल फोन मांगा था, लेकिन उन्होंने पांच बार एक ही जवाब दिया—“मोबाइल टूट गया है।” यही बात पुलिस को और संदेहास्पद लग रही है।
2021 में खुद थाने पहुंचकर रिपोर्ट लिखवाई थी—अब वही मामला बना मुसीबत की जड़
इस पूरे प्रकरण की विचित्रता यह है कि विजेंद्रसिंह रावत इस पूरे केस में खुद ही फरियादी हैं। वर्ष 2021 में उन्होंने थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज करवाई थी। लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, कई कड़ियां उन्हीं की भूमिका पर आकर रुकने लगीं।
सूत्रों के अनुसार, रावत की गिरफ्तारी से एक अन्य पूर्व पदस्थ जज पर भी असर पड़ेगा, जिनके माध्यम से रावत और आईएएस वर्मा के बीच नजदीकियां बढ़ी थीं। वह जज भी अब निलंबन का सामना कर रहा है।
यह मामला अब सिर्फ एक गलत फैसले की कहानी नहीं रह गया है, बल्कि न्यायिक सिस्टम की पारदर्शिता पर गहरे सवाल उठाने लगा है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि जमानत याचिका पर अदालत (IAS Santosh Verma bail) क्या रुख अपनाती है और जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है।
जज की अग्रिम जमानत अर्जी:
जांच की अनुमति मिलते ही दायर की याचिका, पुलिस करेगी कड़ा विरोध।
डिजिटल सबूतों से बढ़ी मुश्किलें:
हार्ड डिस्क, पेनड्राइव और गायब मोबाइल पर टिकी है जांच एजेंसियों की नजर।





