सीजी भास्कर, 26 दिसंबर |भारतीय सिनेमा में इन दिनों एक शब्द बार-बार बहस के केंद्र में है—प्रोपेगेंडा सिनेमा। किसी विचार, नीति या नजरिए को विजुअल (Dhurandhar Film Analysis) माध्यम के जरिए स्थापित करना ही प्रोपेगेंडा कहलाता है। यह केवल फिल्मों तक सीमित नहीं, बल्कि प्रिंट, रेडियो और डिजिटल माध्यमों में भी मौजूद रहा है।
इसी बहस के बीच निर्देशक आदित्य धर की फिल्म धुरंधर एक दिलचस्प केस स्टडी बनकर सामने आई है—जहां कहानी, किरदार और प्रस्तुति ने दर्शकों को उलझन में डाल दिया है कि इसे प्रोपेगेंडा कहा जाए या नहीं।
प्रोपेगेंडा सिनेमा: परिभाषा और बदलता नजरिया
हाल के वर्षों में कई फिल्मों पर प्रोपेगेंडा होने के आरोप लगे—जैसे दी कश्मीर फाइल्स, दी केरला स्टोरी, आर्टिकल 370 या बस्तर – द नक्सल स्टोरी।
इन फिल्मों को एक वर्ग ने एकतरफा बताया, तो दूसरे वर्ग ने इन्हें साहसी सिनेमा कहा। यहीं से सवाल उठता है—क्या प्रोपेगेंडा हमेशा नकारात्मक होता है, या यह देखने वाले के नजरिए पर निर्भर करता है?
क्या धुरंधर भी उसी खांचे में आती है?
धुरंधर पार्ट 1 ने बॉक्स ऑफिस पर असाधारण प्रदर्शन किया और 2025 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल हो गई। इसने कांतारा चैप्टर 1 और छावा जैसी ब्लॉकबस्टर्स को भी पीछे छोड़ा।
फिल्म की कहानी में तथ्य और कल्पना का ऐसा मिश्रण है कि दर्शक यह तय नहीं कर पा रहे—यह राष्ट्रवादी एजेंडा है या एक चतुराई से गढ़ी गई फिक्शनल थ्रिलर।
विलेन का ग्लोरिफिकेशन: कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट
फिल्म का सबसे चर्चित पहलू है—विलेन रहमान डकैत, जिसे अक्षय खन्ना ने निभाया। उनका किरदार इतना प्रभावशाली है कि कई जगह हीरो पर भारी पड़ता दिखता है।
जहां आमतौर पर प्रोपेगेंडा फिल्मों में विलेन को कमजोर और सीमित रखा जाता है, वहीं धुरंधर (Dhurandhar Film Analysis) में उसे स्टाइल, संवाद और स्क्रीन प्रेजेंस के साथ पेश किया गया। यही कारण है कि इसे पारंपरिक प्रोपेगेंडा सिनेमा के फ्रेम में फिट करना मुश्किल हो जाता है।
हीरो बनाम विलेन: संतुलन या रणनीति?
अंडरकवर एजेंट हमजा अली के किरदार में रणवीर सिंह का मिशन अभी अधूरा है। पहले पार्ट में विलेन की छाया इतनी गहरी है कि दर्शक यह सवाल पूछने लगते हैं—क्या कहानी जानबूझकर हीरो को पीछे रख रही है?
तुलना करें तो छावा जैसी फिल्मों में खलनायक सीमित भूमिका में था, जबकि यहां विलेन ही कथा की धुरी बन जाता है। यही वजह है कि धुरंधर को लेकर भ्रम बना हुआ है।
प्रोपेगेंडा: एकतरफा या बहस को जन्म देने वाला?
दरअसल, प्रोपेगेंडा एक सुविधाजनक शब्द भी है। जो विचारधारा एक दर्शक को प्रचार लगती है, वही दूसरे के लिए सच या साहसिक प्रस्तुति हो सकती है। इतिहास गवाह है कि सोवियत सिनेमा से लेकर हॉलीवुड तक—हर देश ने अपने दौर में वैचारिक फिल्में बनाई हैं।
असली कसौटी यह होनी चाहिए कि फिल्म अपने विषय के साथ कितना न्याय करती है और क्या वह दर्शक को सोचने का मौका देती है।
धुरंधर 2: अब क्या होगा एजेंडा?
अब निगाहें धुरंधर 2 पर हैं, जो 19 मार्च (ईद) को रिलीज़ (Dhurandhar Film Analysis) होने वाली है। पार्ट 2 में मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल) सबसे बड़े विलेन के रूप में उभर सकते हैं। रहमान डकैत के बाद हमजा अली का अगला मिशन क्या होगा—यही केंद्रीय टकराव बनेगा।
क्या इस बार हीरो की बैकस्टोरी खुलेगी? क्या पाकिस्तान की खुफिया साजिशें सामने आएंगी? और क्या विलेन फिर से कहानी पर हावी होगा—ये सवाल दर्शकों की उत्सुकता बढ़ा रहे हैं।
निष्कर्ष
धुरंधर सिर्फ एक स्पाई थ्रिलर नहीं, बल्कि मौजूदा दौर के सिनेमा की सोच को समझने की खिड़की है। यह तय करना शायद जरूरी नहीं कि फिल्म प्रोपेगेंडा है या नहीं; ज्यादा अहम यह है कि वह बहस छेड़ रही है, दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर रही है—और यही किसी भी प्रभावशाली सिनेमा की असली जीत होती है।





