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Home » NCP Merger : ‘पावर’ के लिए फिर करीब आये ‘पवार’ चाचा-भतीजा

NCP Merger : ‘पावर’ के लिए फिर करीब आये ‘पवार’ चाचा-भतीजा

By Newsdesk Admin
30/12/2025
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सीजी भास्कर, 30 दिसंबर। महाराष्ट्र की राजनीति में रणनीति और धैर्य के सबसे बड़े खिलाड़ी माने जाने वाले शरद पवार एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। ढाई साल पहले पार्टी टूटने, भतीजे अजित पवार के अलग राह पकड़ने और महायुति सरकार में शामिल होने के बाद जिस सवाल ने सबसे ज्यादा सियासी हलचल पैदा की थी, वही सवाल अब दोबारा ज़ोर पकड़ता दिख रहा है—क्या राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी फिर से एक होने जा रही है? पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम चुनावों के लिए एनसीपी (एसपी) और अजित पवार गुट की एनसीपी का साथ आना इसी दिशा में एक बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। इस अस्थायी तालमेल ने एनसीपी के संभावित पुनर्मिलन (NCP Merger) को लेकर अटकलों को एक बार फिर हवा दे दी है।

पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ दोनों ही क्षेत्र परंपरागत रूप से पवार परिवार और एनसीपी के मजबूत गढ़ रहे हैं। ऐसे में इन नगर निकाय चुनावों में दोनों धड़ों का साथ आना केवल स्थानीय राजनीतिक मजबूरी नहीं, बल्कि भविष्य की बड़ी रणनीति का संकेत भी माना जा रहा है। हालांकि दोनों पक्ष सार्वजनिक रूप से यह दोहराते रहे हैं कि यह गठबंधन सिर्फ इन दो नगर निगम चुनावों तक सीमित है और इसे आगे बढ़ाने की कोई योजना नहीं है, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में बयान और इरादों के बीच का अंतर हमेशा चर्चा का विषय रहा है।

पिछले कुछ समय में शरद पवार और सुप्रिया सुले के राजनीतिक कार्यक्रमों और बयानों पर गौर करें तो यह साफ दिखता है कि पवार परिवार एक बार फिर अपने विकल्पों का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है। एनडीए के प्रति बढ़ती नरमी और बदले सियासी समीकरण इस ओर इशारा करते हैं कि यह तालमेल केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि एनसीपी के अंदरूनी पुनर्गठन (NCP Merger) की भूमिका भी तैयार कर सकता है।

इस गठबंधन के पीछे समय की मजबूरी भी उतनी ही अहम है। भाजपा ने नगर निगम चुनावों में केवल एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ गठबंधन किया है, जबकि कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। ऐसे में न अजित पवार के पास और न ही शरद पवार गुट के पास ज्यादा विकल्प बचे थे। पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ जैसे इलाकों में अगर पवार परिवार बंटा रहता, तो भाजपा के लिए वहां बड़ी सेंध लगाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता था। यही सियासी गणित दोनों धड़ों को पास लाया और एनसीपी के संभावित एकीकरण (NCP Merger) की चर्चाओं को तेज कर गया।

पुणे नगर निगम में सीट बंटवारे की तस्वीर इस रणनीति को और स्पष्ट करती है। यहां अजित पवार गुट की एनसीपी 125 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि शरद पवार की एनसीपी (एसपी) 40 सीटों पर उम्मीदवार उतार रही है। यह बंटवारा दोनों गुटों की स्थानीय ताकत और आपसी समझ का संकेत देता है। पिंपरी-चिंचवड़ में भी यही फॉर्मूला अपनाया गया है। दोनों दल अपने-अपने चुनाव चिन्हों पर चुनाव लड़ रहे हैं, यानी औपचारिक मर्जर नहीं, लेकिन जमीनी स्तर पर समन्वय साफ दिखाई दे रहा है, जिसे एनसीपी के पुनर्मिलन (NCP Merger) की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

इन नगर निगम चुनावों को अब महायुति बनाम महा विकास अघाड़ी की सीधी लड़ाई से ज्यादा, सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर जमीनी ताकत मजबूत करने की प्रतिस्पर्धा के तौर पर देखा जा रहा है। दिसंबर 2025 में हुए नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों में महायुति ने 288 में से 211 निकायों पर कब्जा जमाया था, जबकि एमवीए केवल 46 निकायों तक सिमट गई थी। इन नतीजों ने शरद पवार गुट को गहरा झटका दिया और पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा फैला दी। कई स्थानों पर कार्यकर्ताओं ने खुलकर अजित पवार गुट के साथ तालमेल की मांग उठाई, जिससे एनसीपी के संभावित मर्जर (NCP Merger) की ज़मीन और मजबूत हुई।

28 दिसंबर को अजित पवार ने पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम चुनाव के लिए गठबंधन की घोषणा करते हुए इसे “परिवार का फिर से एकजुट होना” बताया। अगले ही दिन 29 दिसंबर को पुणे नगर निगम के लिए भी गठबंधन फाइनल हो गया। हालांकि रोहित पवार ने स्पष्ट किया कि यह गठबंधन स्थानीय कार्यकर्ताओं की मांग पर हुआ है और इसे मर्जर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शरद पवार चुनाव प्रचार से दूरी बनाए रखेंगे। इसके बावजूद राजनीतिक जानकार इसे एनसीपी के संभावित एकीकरण (NCP Merger) की दिशा में पहला ठोस संकेत मान रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स में मर्जर की चर्चाएं भी तेज हैं। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, यदि भविष्य में औपचारिक एकीकरण होता है तो सत्ता और संगठन की जिम्मेदारियां पहले से तय फॉर्मूले के तहत बांटी जा सकती हैं। इसमें अजित पवार के पास राज्य की राजनीति और सुप्रिया सुले के पास राष्ट्रीय स्तर की भूमिका रहने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि इस राह में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। शरद पवार गुट के कई नेता अजित पवार के भाजपा के साथ गठबंधन को लेकर असहज हैं और उनके नेतृत्व में काम करने को तैयार नहीं दिखते।

अगर यह तालमेल आगे चलकर औपचारिक रूप लेता है, तो इसका सीधा असर महा विकास अघाड़ी पर पड़ेगा, जो पहले ही स्थानीय चुनावों में कमजोर साबित हो चुकी है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना और कांग्रेस दोनों ही संघर्ष के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में एनसीपी का संभावित पुनर्मिलन (NCP Merger) महाराष्ट्र की राजनीति का संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।

अब सबकी निगाहें पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ के नतीजों पर टिकी हैं। अगर दोनों एनसीपी धड़े यहां अच्छा प्रदर्शन करते हैं, तो ज़िला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में भी इसी तरह के तालमेल की मांग तेज हो सकती है। साफ है कि महाराष्ट्र की राजनीति एक बड़े मोड़ पर खड़ी है और आने वाले समय में यह गठबंधन राज्य की सियासत को नई दिशा दे सकता है।

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