सीजी भास्कर, 02 जनवरी। सऊदी अरब ने वर्ष 2025 में मृत्युदंड के मामलों में ऐसा आंकड़ा (Saudi Death Penalty Record) छू लिया है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस साल कुल 356 लोगों को फांसी दी गई, जो अब तक एक कैलेंडर वर्ष में सबसे अधिक मानी जा रही है। खास बात यह है कि इन मामलों में ड्रग्स से जुड़े अपराध सबसे आगे रहे हैं।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, 2025 में जिन लोगों को फांसी दी गई, उनमें से 243 मामले नशीले पदार्थों की तस्करी, भंडारण और सप्लाई से जुड़े थे। यह लगातार दूसरा साल है जब सऊदी अरब ने मृत्युदंड का नया रिकॉर्ड बनाया है। इससे पहले 2024 में 338 लोगों को फांसी दी गई थी।
ड्रग्स के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ोतरी सऊदी सरकार की ड्रग्स के खिलाफ अपनाई गई बेहद सख्त नीति का नतीजा है। करीब तीन साल के अंतराल के बाद, 2022 के अंत में ड्रग्स अपराधों पर मृत्युदंड फिर से लागू किया गया था। अब उन मामलों में सजा दी जा रही है, जिनमें कानूनी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।
सऊदी अरब लंबे समय से कैप्टागन जैसे प्रतिबंधित नशीले पदार्थों की तस्करी से जूझ रहा है। ये ड्रग्स पहले सीरिया से बड़े पैमाने पर खाड़ी देशों में पहुंचती (Saudi Death Penalty Record) थीं। इसी को देखते हुए सरकार ने हाईवे, सीमावर्ती इलाकों और बंदरगाहों पर सुरक्षा कड़ी कर दी है। लाखों गोलियां जब्त की गई हैं और दर्जनों तस्करों को गिरफ्तार किया गया है।
विदेशी नागरिक भी बड़ी संख्या में प्रभावित
इस सख्त अभियान का असर सिर्फ स्थानीय नागरिकों तक सीमित नहीं रहा। रिपोर्ट्स के अनुसार, फांसी पाए लोगों में बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की भी है, जो ड्रग्स नेटवर्क से जुड़े मामलों में दोषी पाए गए थे। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सऊदी अरब की नीतियों पर सवाल उठने लगे हैं।
मानवाधिकार संगठनों की तीखी आलोचना
मृत्युदंड के बढ़ते आंकड़ों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार (Saudi Death Penalty Record) संगठनों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में फांसी देना न सिर्फ कठोर है, बल्कि उस आधुनिक और सुधारवादी छवि के भी विपरीत है, जिसे मोहम्मद बिन सलमान अपनी विजन 2030 योजना के तहत पेश करना चाहते हैं।
गौरतलब है कि सऊदी अरब इन दिनों पर्यटन, इंटरनेशनल स्पोर्ट्स इवेंट्स और ग्लोबल निवेश को आकर्षित करने पर जोर दे रहा है। देश 2034 फुटबॉल वर्ल्ड कप की मेजबानी की तैयारियों में भी जुटा है। ऐसे में मानवाधिकारों को लेकर उठ रहे सवाल उसकी वैश्विक छवि पर असर डाल सकते हैं।





