सीजी भास्कर, 09 जनवरी। खेती के बदलते दौर में अब किसान परंपरागत फसलों से आगे बढ़कर ऐसी खेती की ओर रुख कर रहे हैं, जिसमें जोखिम कम और मुनाफा (Medicinal Crops For Farmers) ज्यादा हो। इन्हीं विकल्पों में लेमनग्रास यानी नींबू घास की खेती तेजी से किसानों की पसंद बनती जा रही है। कम लागत, कम पानी और साल में कई बार कटाई की सुविधा के चलते यह फसल अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने लगी है।
लेमनग्रास की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे उपजाऊ खेतों तक सीमित नहीं रहना पड़ता। पथरीली, हल्की या बंजर ज़मीन पर भी यह अच्छी पैदावार देती है। भरपूर धूप और सामान्य देखरेख में यह फसल साल में 4 से 5 बार कटाई का अवसर देती है, जिससे किसानों को नियमित आमदनी मिलती रहती है।
सरकारी प्रोत्साहन से मिली नई दिशा
राज्य सरकार ने औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। इसी क्रम में लेमनग्रास की खेती करने वाले किसानों को औषधि पादप बोर्ड के माध्यम से निःशुल्क पौध सामग्री (स्लिप्स) उपलब्ध कराई (Medicinal Crops For Farmers) जा रही है। खेती को व्यवस्थित रूप से विकसित करने के लिए 40 से 50 किसानों के समूह बनाकर क्लस्टर पद्धति अपनाई जा रही है, ताकि तकनीकी मार्गदर्शन और विपणन में आसानी हो।
इसके अलावा किसानों को प्रशिक्षण, अध्ययन भ्रमण, तकनीकी सलाह और तेल की खरीदी के लिए एमओयू जैसी सुविधाएं भी दी जा रही हैं, जिससे छोटे किसान भी बिना किसी झंझट के इस खेती से जुड़ सकें।
खेती की तकनीक और ज़रूरी जानकारी
लेमनग्रास (Cymbopogon flexuosus) एक बहुवर्षीय सुगंधित घास है। इसकी खेती के लिए मिट्टी का पीएच मान 6.6 से 8.0 के बीच उपयुक्त माना जाता है। जून का महीना पौध रोपण के लिए सबसे अच्छा समय है। एक एकड़ क्षेत्र में लगभग 25 हजार पौधों की आवश्यकता होती है।
गोबर खाद या कम्पोस्ट खाद से उत्पादन में सुधार होता है। सामान्य तौर पर 7 से 10 दिन में एक बार सिंचाई पर्याप्त (Medicinal Crops For Farmers) रहती है। खास बात यह है कि इस फसल में कीट-रोगों का प्रकोप बेहद कम होता है, इसलिए कीटनाशकों पर अतिरिक्त खर्च नहीं करना पड़ता।
कटाई, तेल और मुनाफा
पहली कटाई रोपाई के करीब छह महीने बाद की जाती है। इसके बाद हर तीन महीने में कटाई संभव होती है। एक बार फसल लगाने के बाद करीब पांच साल तक लगातार उत्पादन लिया जा सकता है। कटाई के बाद घास को आसवन प्रक्रिया के जरिए तेल में बदला जाता है, जिसकी मांग साबुन, कॉस्मेटिक्स, अरोमा और दवा उद्योग में लगातार बनी रहती है।
पहले वर्ष प्रति एकड़ 60 से 80 किलो तक तेल निकलता है, जबकि दूसरे वर्ष से यह मात्रा लगभग 100 किलो तक पहुंच जाती है। बाजार में इसका मूल्य 1200 से 1600 रुपये प्रति किलो तक रहता है। औसतन 20 हजार रुपये की वार्षिक लागत में किसान 80 हजार से एक लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ कमा सकते हैं।
किसानों के लिए क्यों है बेहतर विकल्प
कम लागत, सुरक्षित खेती, लंबी अवधि तक उत्पादन और तैयार बाजार—ये सभी कारण लेमनग्रास को किसानों के लिए एक भरोसेमंद और लाभकारी विकल्प बनाते हैं। औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने की यह पहल न सिर्फ किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की नई कहानी भी लिख रही है।


