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Live-in Relationship Legal Validity: लिव-इन से वैध पति-पत्नी का रिश्ता नहीं बनता, हाईकोर्ट ने साफ किया कानून

By Newsdesk Admin
15/01/2026
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सीजी भास्कर, 15 जनवरी | Live-in Relationship Legal Validity : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल लिव-इन रिलेशनशिप के आधार पर पति-पत्नी का वैध रिश्ता स्थापित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब तक पहली शादी कानूनी रूप से समाप्त नहीं होती, तब तक दूसरी महिला और उससे जुड़े बच्चों को पति की संपत्ति या पारिवारिक अधिकार नहीं मिल सकते।

Contents
  • याचिका खारिज, रिश्ते को नहीं मिली कानूनी मान्यता
  • क्या था पूरा विवाद, जानिए मामला
  • पहली शादी का अस्तित्व बना सबसे बड़ा मुद्दा
  • वरमाला और साथ रहना, शादी नहीं मानी जाएगी
  • बच्चों की वैधता पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
  • फैमिली कोर्ट के फैसले को मिली हाईकोर्ट की मुहर
  • हिंदू विवाह अधिनियम का किया गया स्पष्ट उल्लेख
  • सरकारी दस्तावेज भी बने फैसले का आधार
  • कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष

याचिका खारिज, रिश्ते को नहीं मिली कानूनी मान्यता

हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें एक महिला और उसकी दो बेटियों ने एक प्रतिष्ठित नागरिक को पति और पिता घोषित करने की मांग की थी। कोर्ट ने दो टूक कहा कि Live-in Relationship Legal Validity कानून से तय होती है, न कि आपसी सहमति या लंबे साथ रहने से।

क्या था पूरा विवाद, जानिए मामला

मामला बिलासपुर का है, जहां दो युवतियों ने अपनी मां के साथ मिलकर फैमिली कोर्ट में दावा किया था कि उनकी मां को संबंधित व्यक्ति की कानूनी पत्नी और उन्हें उसकी वैध संतान माना जाए। उनका तर्क था कि महिला वर्षों तक उस पुरुष के साथ पति-पत्नी की तरह रहती रही।

पहली शादी का अस्तित्व बना सबसे बड़ा मुद्दा

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि महिला की पहली शादी वर्ष 1960 में हुई थी, जो विधिक रूप से कभी समाप्त नहीं हुई। न तो तलाक का कोई दस्तावेज प्रस्तुत किया गया और न ही पहले पति की मृत्यु का कोई प्रमाण सामने आया। यही बिंदु Marriage Law India के तहत मामले का आधार बना।

वरमाला और साथ रहना, शादी नहीं मानी जाएगी

कोर्ट ने कहा कि वरमाला डालना, साथ रहना या सामाजिक रूप से पति-पत्नी की तरह रहना, कानूनी विवाह का विकल्प नहीं हो सकता। जब पहली शादी जीवित है, तब दूसरी शादी स्वतः ही कानूनन शून्य मानी जाएगी।

बच्चों की वैधता पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह के दौरान जन्मे बच्चों की वैधता उसी पति से जुड़ी रहती है, जिससे महिला की कानूनी शादी हुई हो। किसी अन्य पुरुष द्वारा बच्चों को स्वीकार कर लेने से Child Legitimacy Law के सिद्धांत नहीं बदलते।

फैमिली कोर्ट के फैसले को मिली हाईकोर्ट की मुहर

फैमिली कोर्ट पहले ही इस मामले को संपत्ति विवाद से जुड़ा मानते हुए खारिज कर चुका था। हाईकोर्ट ने सभी साक्ष्यों और दस्तावेजों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और अपील खारिज कर दी।

हिंदू विवाह अधिनियम का किया गया स्पष्ट उल्लेख

कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 और 11 का हवाला देते हुए कहा कि जब पति या पत्नी जीवित हों और तलाक न हुआ हो, तब दूसरा विवाह अवैध माना जाएगा। ऐसे रिश्ते से किसी प्रकार का वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं होता।

सरकारी दस्तावेज भी बने फैसले का आधार

सुनवाई में यह भी सामने आया कि आधार कार्ड और अन्य सरकारी रिकॉर्ड में बेटियों के पिता के रूप में पहले पति का ही नाम दर्ज है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि कानूनी रूप से पितृत्व में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष

डिवीजन बेंच ने कहा कि कानून भावनाओं या स्वीकारोक्ति से नहीं चलता। बिना तलाक दूसरी शादी, लिव-इन या मौखिक स्वीकारोक्ति के आधार पर न तो पत्नी का दर्जा दिया जा सकता है और न ही उत्तराधिकार का अधिकार।

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