सीजी भास्कर, 15 जनवरी। राज्य और केंद्र शासन की योजनाएं (PM Vishwakarma Yojana) जब जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू होती हैं, तो वे पारंपरिक आजीविका से जुड़े लोगों के जीवन में ठोस बदलाव लाती हैं। ऐसी ही एक सशक्त पहल के रूप में पी.एम. विश्वकर्मा योजना सामने आई है, जिसने पारंपरिक कारीगरों को आधुनिक तकनीक से जोड़कर आत्मनिर्भरता की राह दिखाई है। कोरबा जिले के कुम्हार रामकुमार प्रजापति की कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे पी.एम. विश्वकर्मा योजना ने एक पारंपरिक कला को नई पहचान और स्थायी रोजगार का माध्यम बना दिया।
रामकुमार प्रजापति वर्षों से कुम्हार कला से जुड़े हुए हैं। मिट्टी को आकार देने की यह कला उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिली थी। लंबे समय तक उन्होंने परंपरागत तरीके से मिट्टी के बर्तन बनाकर अपनी आजीविका चलाई, लेकिन समय के साथ बाजार में आधुनिक डिजाइन, बेहतर फिनिश और तेजी से उत्पादन की मांग बढ़ती गई। संसाधनों और तकनीक के अभाव में उनका व्यवसाय सीमित होता चला गया और आय पर भी असर पड़ने लगा। ऐसे कठिन दौर में (PM Vishwakarma Yojana) उनके जीवन में उम्मीद की नई रोशनी बनकर सामने आई।
पी.एम. विश्वकर्मा योजना के तहत रामकुमार प्रजापति को लाइवलीहुड कॉलेज, कोरबा में कुम्हार ट्रेड का प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिला। इस प्रशिक्षण में उन्होंने पारंपरिक कुम्हार चाक के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक चाक के उपयोग की आधुनिक तकनीक सीखी। इलेक्ट्रॉनिक चाक के माध्यम से कम समय में अधिक उत्पादन, बेहतर आकार और आकर्षक डिजाइन के मिट्टी के बर्तन तैयार करना संभव हुआ। इससे उनके काम की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ बाजार में मांग भी बढ़ी, जो (PM Vishwakarma Yojana) की वास्तविक सफलता को दर्शाता है।
प्रशिक्षण अवधि के दौरान शासन की ओर से 4,000 रुपये की स्टाइपेंड राशि प्रदान की गई, जिससे प्रशिक्षण के समय आर्थिक सहयोग मिला। इसके अतिरिक्त, बिना किसी गारंटर के एक लाख रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराया गया। इस राशि से रामकुमार प्रजापति ने इलेक्ट्रॉनिक चाक, कच्चा माल और अन्य आवश्यक उपकरण खरीदे, जिससे उनके व्यवसाय को नई गति मिली। आज वे आधुनिक और पारंपरिक दोनों प्रकार के मिट्टी के पात्र तैयार कर रहे हैं, जो ग्राहकों को काफी पसंद आ रहे हैं। यह बदलाव (PM Vishwakarma Yojana) के माध्यम से संभव हो सका।
वर्तमान में रामकुमार प्रजापति पाली क्षेत्र के बाजारों में नियमित रूप से अपनी दुकान लगाते हैं और स्वरोजगार के जरिए सम्मानजनक आय अर्जित कर रहे हैं। उनकी बनाई हुई वस्तुएं न केवल स्थानीय बाजार में, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी पहचान बना रही हैं। उनका कहना है कि यदि उन्हें समय पर यह योजना का लाभ नहीं मिलता, तो शायद वे अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़ने पर मजबूर हो जाते। आज वे आत्मनिर्भर हैं और अन्य कारीगरों को भी (PM Vishwakarma Yojana) से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
यह कहानी बताती है कि जब परंपरा को तकनीक से जोड़ा जाता है और शासन का सहयोग मिलता है, तो पारंपरिक कारीगर भी आधुनिक दौर में सम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ आगे बढ़ सकते हैं।


