सीजी भास्कर, 15 जनवरी। राज्य शासन द्वारा किसानों (Organic Farming) को टिकाऊ, पर्यावरण अनुकूल एवं लाभकारी कृषि पद्धतियों से जोड़ने के उद्देश्य से संचालित योजनाएं अब ज़मीनी स्तर पर स्पष्ट और सकारात्मक परिणाम देने लगी हैं। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में परंपरागत खेती से आगे बढ़कर वैज्ञानिक और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों की ओर किसानों का रुझान बढ़ रहा है। इसी कड़ी में मुंगेली जिले के विकासखंड पथरिया के ग्राम मोहदी निवासी कृषक मूलचंद बंजारे ने जैविक खेतीको अपनाकर अपनी खेती की दिशा ही नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति और जीवनशैली की तस्वीर भी पूरी तरह बदल दी है। राज्य पोषित जैविक खेती मिशन योजना उनके लिए वरदान साबित हुई है।
मूलचंद बंजारे पूर्व में परंपरागत रासायनिक खेती किया करते थे। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के चलते उनकी फसलों में लगातार कीट एवं रोगों का प्रकोप बना रहता था। लागत लगातार बढ़ती जा रही थी, लेकिन उसके अनुपात में न तो उत्पादन बढ़ पा रहा था और न ही मुनाफा मिल रहा था। खेती धीरे-धीरे घाटे का सौदा बनती जा रही थी। ऐसे समय में कृषि विभाग के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी के संपर्क में आने के बाद उन्हें (जैविक खेती) और वैज्ञानिक पद्धतियों के लाभों की जानकारी मिली।
कृषि विभाग (Organic Farming) के तकनीकी मार्गदर्शन में मूलचंद बंजारे ने राज्य पोषित जैविक खेती मिशन योजना के अंतर्गत खेती की नई शुरुआत की। उन्होंने सबसे पहले खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई कर मिट्टी को तैयार किया, जिससे कीटों के अंडे नष्ट हो सकें और मिट्टी की संरचना बेहतर हो। इसके बाद हरी खाद के रूप में सनई बीज की बोनी की गई, जिससे मिट्टी की उर्वरता प्राकृतिक रूप से बढ़ाई जा सके। यह कदम (जैविक खेती) की दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार बना।
खेती (Organic Farming) के दौरान प्रमाणित एवं उन्नत किस्म के बीजों का उपयोग किया गया। बीज बोने से पहले बीज उपचार किया गया, जिसमें ट्रायकोडर्मा से बीज शोधन कर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई गई। इसके साथ ही पी.एस.बी. कल्चर का प्रयोग कर फास्फोरस की उपलब्धता सुनिश्चित की गई। संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया, ताकि फसल को आवश्यक पोषण समय पर मिल सके। यह संपूर्ण प्रक्रिया (जैविक खेती) के वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित रही।
फसल की वृद्धि के दौरान जिंक सल्फेट का समय पर प्रयोग किया गया, जिससे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर हो सके। गभोट अवस्था में प्रति एकड़ 2 किलोग्राम बोरान का छिड़काव किया गया, जिससे दानों का विकास बेहतर हुआ। इन सभी जैविक एवं वैज्ञानिक उपायों का सीधा असर फसल की सेहत पर दिखाई दिया। खेतों में कीट एवं रोगों का प्रकोप उल्लेखनीय रूप से कम हुआ, जिससे रासायनिक दवाओं पर होने वाला खर्च लगभग समाप्त हो गया। यह बदलाव (जैविक खेती) के सकारात्मक प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
इन प्रयासों के परिणामस्वरूप धान की फसल से निर्धारित उत्पादन लक्ष्य प्राप्त हुआ। न केवल उत्पादन में सुधार हुआ, बल्कि उपज की गुणवत्ता भी बेहतर रही। बेहतर गुणवत्ता के कारण बाजार में उपज का उचित मूल्य मिला, जिससे मूलचंद बंजारे की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। लागत कम होने और मुनाफा बढ़ने से उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है। खेती को लेकर जो निराशा पहले बनी हुई थी, उसकी जगह अब आत्मविश्वास और संतोष ने ले ली है।
मूलचंद बंजारे का कहना है कि (जैविक खेती) केवल एक खेती की पद्धति नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और मानव स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे मिट्टी की सेहत बनी रहती है, जल स्रोत सुरक्षित रहते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए टिकाऊ कृषि संभव हो पाती है। उन्होंने अन्य किसानों से भी अपील की है कि वे कृषि विभाग द्वारा संचालित योजनाओं का लाभ उठाएं और वैज्ञानिक व जैविक पद्धतियों को अपनाकर अपनी आय और जीवन स्तर में सुधार लाएं।





