सीजी भास्कर, 17 जनवरी। बस्तर संभाग की आत्मा, उसकी आदिम परंपराएं और लोकसंस्कृति एक बार फिर बस्तर पण्डुम 2026 (Bastar Pandum 2026) के माध्यम से पूरे वैभव के साथ सामने आईं। दरभा से लेकर तोकापाल तक फैले आयोजन स्थलों पर जनजातीय समाज की जीवनशैली, नृत्य, गीत, वेशभूषा, शिल्प और खान-पान ने ऐसा समां बांधा कि हर दर्शक बस्तर की सांस्कृतिक विरासत में डूबता चला गया। यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर की पीढ़ियों से चली आ रही पहचान और आत्मगौरव का सार्वजनिक मंच बनकर उभरा।
दरभा विकासखंड में आयोजित (Bastar Pandum 2026) के कार्यक्रमों में मुरिया, माड़िया, दोरला, हल्बा और भतरा जनजातियों के पारंपरिक नृत्यों ने विशेष आकर्षण पैदा किया। मांदर, ढोल, टिमकी और बांसुरी की लय पर थिरकते कदम, रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्रों में सजे कलाकार और सामूहिक नृत्य की ऊर्जा ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। मंच के साथ-साथ खुले मैदानों में भी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां चलती रहीं, जिससे पूरा इलाका उत्सवमय वातावरण में रंग गया।
तोकापाल क्षेत्र में (Bastar Pandum 2026) का स्वरूप और भी व्यापक नजर आया। यहां आदिम जनजातीय संस्कृति की झलक लोककला, हस्तशिल्प और पारंपरिक खान-पान के स्टॉलों के माध्यम से देखने को मिली। सल्फी, कोदो-कुटकी से बने व्यंजन, महुआ से जुड़े पारंपरिक उत्पाद और स्थानीय वन उपज ने बस्तर के आत्मनिर्भर जीवन दर्शन को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। शिल्पकारों द्वारा लकड़ी, लोहे और बांस से बने उत्पादों ने यह संदेश दिया कि बस्तर की संस्कृति आज भी प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीना सिखाती है।
बस्तर पण्डुम 2026 (Bastar Pandum 2026) का मुख्य उद्देश्य केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके जरिए जनजातीय युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने और पारंपरिक ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास भी किया गया। आयोजन में लोककथाओं, पारंपरिक खेलों और आदिवासी जीवन दर्शन पर आधारित प्रस्तुतियों ने यह स्पष्ट किया कि बस्तर की संस्कृति केवल अतीत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की दिशा भी तय करती है।
कार्यक्रम के दौरान स्थानीय कलाकारों, नृत्य दलों और शिल्पकारों को सम्मानित किया गया, जिससे उनमें आत्मविश्वास और गर्व की भावना और मजबूत हुई। सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि (Bastar Pandum 2026) जैसे आयोजनों से बस्तर की पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और सशक्त होती है। इससे न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलता है, बल्कि स्थानीय रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति मिलती है।
दरभा से तोकापाल तक फैला यह उत्सव यह बताने में सफल रहा कि बस्तर केवल प्राकृतिक सौंदर्य का क्षेत्र नहीं, बल्कि जीवंत परंपराओं और सामुदायिक एकता की मिसाल है। जनजातीय समाज की सामूहिक भागीदारी, महिलाओं की सक्रिय भूमिका और युवाओं की उत्साही मौजूदगी ने इस आयोजन को और भी प्रभावशाली बना दिया। हर प्रस्तुति में प्रकृति, जीवन और संघर्ष की कहानियां साफ झलकती रहीं।
समग्र रूप से देखें तो (Bastar Pandum 2026) ने बस्तर की आदिम संस्कृति को केवल मंच पर नहीं, बल्कि जन-जन के मन में स्थापित करने का कार्य किया। यह आयोजन आने वाले समय में बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने और वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक मजबूत कदम के रूप में याद किया जाएगा।


