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Rehabilitation of Surrendered Naxalites: जंगल से हुनर तक, आत्मसमर्पित नक्सलियों की बदली हुई दुनिया

By Newsdesk Admin
09/02/2026
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Rehabilitation of Surrendered Naxalites : छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में स्थित लाइवलीहुड कॉलेज आज सिर्फ एक प्रशिक्षण संस्थान नहीं रह गया है, बल्कि यह उन लोगों के लिए नई ज़िंदगी का रास्ता बन चुका है, जो कभी हिंसा और बंदूक की दुनिया में थे। यहां रह रहे 110 आत्मसमर्पित नक्सली अब सिलाई, ड्राइविंग, मैकेनिक, सोलर तकनीक और नल मरम्मत जैसे व्यावसायिक कौशल सीख रहे हैं, ताकि वे समाज की मुख्यधारा में दोबारा अपनी जगह बना सकें.

Contents
  • कड़ी सुरक्षा, सीमित प्रवेश
  • हथियारों से औज़ारों तक का सफर
  • कैसे बहकाए जाते थे बच्चे और युवा
  • जंगल का डॉक्टर, अब आम इंसान
  • जंगल में बनते थे हथियार
  • महिलाओं की अनसुनी पीड़ा
  • संगठन के कठोर नियम
  • अतीत से बाहर निकलने की जंग
  • सम्मान के साथ नई पहचान

कड़ी सुरक्षा, सीमित प्रवेश

कॉलेज परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम हैं। बाहरी लोगों का बिना अनुमति प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। यह सतर्कता इसलिए बरती जा रही है ताकि आत्मसमर्पित नक्सलियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और वे बिना किसी डर के प्रशिक्षण ले सकें। प्रशासन का मानना है कि सुरक्षित माहौल ही पुनर्वास की पहली शर्त है।

हथियारों से औज़ारों तक का सफर

कभी हाथों में हथियार थामने वाले ये लोग अब औज़ारों के सहारे अपना भविष्य गढ़ रहे हैं। इनमें से कई ऐसे हैं, जिन पर कभी लाखों रुपये का इनाम घोषित था। जंगलों में लगातार संघर्ष, मुठभेड़ और पलायन के बाद अब वे स्थिर और सम्मानजनक जीवन की ओर कदम बढ़ा रहे हैं.

कैसे बहकाए जाते थे बच्चे और युवा

पंडीराम ध्रुव बताते हैं कि गांवों में नाटक, गीत और सभाओं के जरिए युवाओं को संगठन से जोड़ा जाता था। जल, जंगल और जमीन बचाने की बातें कर भावनात्मक रूप से उन्हें प्रभावित किया जाता, फिर धीरे-धीरे हथियार चलाने और हिंसक गतिविधियों में शामिल किया जाता था।

जंगल का डॉक्टर, अब आम इंसान

सुखलाल बताते हैं कि बहुत कम उम्र में उन्हें संगठन में भर्ती कर लिया गया था। प्राथमिक इलाज से लेकर छोटी सर्जरी तक की ट्रेनिंग दी गई। कई बार मुठभेड़ों के दौरान घायल साथियों की जान बचाई, लेकिन लगातार मौतें और बढ़ता दबाव उन्हें भीतर से तोड़ता चला गया, जिसके बाद आत्मसमर्पण ही एकमात्र रास्ता लगा।

जंगल में बनते थे हथियार

दिवाकर गावड़े ने खुलासा किया कि जंगल में ही बीजीएल और 12 बोर जैसी बंदूकें तैयार की जाती थीं। इन्हीं हथियारों का इस्तेमाल कई मुठभेड़ों में हुआ। पुलिस कार्रवाई के बढ़ते डर और अनिश्चित भविष्य ने उन्हें भी संगठन छोड़ने पर मजबूर किया।

महिलाओं की अनसुनी पीड़ा

रमली और कमला जूरी जैसी महिलाएं बताती हैं कि उन्हें अन्याय के खिलाफ लड़ाई के नाम पर संगठन में शामिल किया गया। जंगल की कठिन जिंदगी, लगातार भागते रहना और डर के माहौल ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला.

संगठन के कठोर नियम

कमला जूरी के अनुसार, संगठन में शादी के बाद पुरुषों की नसबंदी कराई जाती थी ताकि पारिवारिक जिम्मेदारियां संघर्ष के रास्ते में बाधा न बनें। इसे संगठन की रणनीति बताया जाता था, लेकिन इसका मानवीय असर बेहद भयावह था।

अतीत से बाहर निकलने की जंग

कॉलेज प्रशासन के अनुसार, कई आत्मसमर्पित नक्सली आज भी मानसिक रूप से अपने अतीत में फंसे हुए हैं। कुछ लोग खुलकर हंस भी नहीं पाते और गांव लौटने से डरते हैं। इसके बावजूद वे अनुशासित हैं और सीखने की तीव्र इच्छा रखते हैं.

सम्मान के साथ नई पहचान

पुनर्वास केंद्र का उद्देश्य इन लोगों को सिर्फ प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि समाज में सम्मान के साथ दोबारा स्थापित करना है। सरकार और प्रशासन का मानना है कि आत्मनिर्भरता ही हिंसा से स्थायी मुक्ति का रास्ता है। जंगल की बंदूकें अब पीछे छूट चुकी हैं, सामने है शांत और स्थिर भविष्य।

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