छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के हालिया निर्णय में (Abetment of Suicide Verdict) को लेकर अहम व्याख्या सामने आई है। अदालत ने साफ किया कि पति–पत्नी के बीच रोज़मर्रा के मतभेद, तकरार या घरेलू तनाव को अपने-आप आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता, जब तक उसके पीछे स्पष्ट आपराधिक मंशा और प्रत्यक्ष प्रेरणा के पुख्ता सबूत न हों।
पुराने फैसले पर दोबारा नजर
मामले की अपील सुनते हुए (High Court Ruling India) के तहत ट्रायल कोर्ट के निर्णय की गहन समीक्षा की गई। निचली अदालत ने पहले आरोपी पति को दोषी ठहराते हुए सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी, लेकिन उच्च अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों को परखते हुए यह पाया कि आरोप सिद्ध करने का आधार कमजोर था।
पोस्टमार्टम और साक्ष्यों में उलझन
अदालत के सामने पेश रिपोर्टों में मौत का कारण एकमत नहीं था। चिकित्सकीय राय में भी अलग-अलग संभावनाएं दर्ज थीं, जबकि फॉरेंसिक साक्ष्य निर्णायक रूप से प्रस्तुत नहीं किए गए। (Suicide Abetment Law) के मानकों के अनुसार, केवल संदेह या परोक्ष अनुमान के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।
गवाहियों में विरोधाभास
मुकदमे के दौरान गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते दिखे। किसी ने एक कारण बताया, तो किसी ने दूसरा। (Evidence in Criminal Case) के सिद्धांत के मुताबिक, जब साक्ष्य ठोस और एकरूप न हों, तब आरोपी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं माना जाता।
संदेह का लाभ और रिहाई
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आपराधिक मामलों में संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना कानून की मूल भावना है। (Justice Delivery System) के तहत, अभियोजन पक्ष यदि आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाए, तो सजा को बनाए रखना उचित नहीं होता। इसी आधार पर आरोपी की सजा निरस्त कर दी गई।





