सीजी भास्कर, 10 अप्रैल। बस्तर संभाग के सुदूर वनांचल क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसा खामोश बदलाव (Bastar Infrastructure Growth) आया है जिसने दशकों पुरानी दहशत की तस्वीर को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। जिले के दरभा विकासखंड का कोलेंग क्षेत्र, जो कभी माओवादी गतिविधियों का केंद्र होने के कारण विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह कटा हुआ था, आज प्रगति के नए सोपान तय कर रहा है।
कभी यहाँ के सन्नाटे में केवल खौफ का पहरा हुआ करता था, लेकिन आज यहाँ की फिजाओं में खुशहाली और उम्मीद की एक नई इबारत लिखी जा रही है। शासन और प्रशासन की सक्रियता ने इस दुर्गम इलाके की भौगोलिक बाधाओं को पार करते हुए यहाँ के ग्रामीणों को वह बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं, जिनके लिए वे पीढ़ियों से तरस रहे थे। आज स्थिति यह है कि कोलेंग और उसके आसपास के दर्जनों गाँवों में सड़कों का जाल बिछ चुका है और बिजली की रोशनी ने उस अंधेरे को मिटा दिया है जो कभी यहाँ की स्थायी पहचान बन चुका था।
दुर्गम रास्तों पर दौड़ती विकास की गाड़ियाँ (Bastar Infrastructure Growth)
भौगोलिक रूप से जटिल और घने जंगलों से घिरे इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती हमेशा से आवागमन की रही है। एक समय था जब बारिश के चार महीनों में कोलेंग, चांदामेटा, छिंदगुर, काचीरास और कान्दानार जैसे गाँव पूरी तरह टापू में तब्दील हो जाते थे और बीमारों को अस्पताल ले जाने के लिए चारपाई का सहारा लेना पड़ता था। आज बारहमासी पक्की सड़कों के निर्माण ने इन गाँवों की दूरी जिला मुख्यालय जगदलपुर से काफी कम कर दी है।
इन पक्की सड़कों के बनने से न केवल ग्रामीणों का सफर आसान हुआ है, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी आपातकालीन सेवाएँ भी अब चौबीस घंटे उपलब्ध हैं। अब यहाँ एम्बुलेंस और स्कूल बसें गाँव के भीतर तक पहुँच रही हैं, जो इस बात का संकेत है कि बस्तर का यह वनांचल अब पिछड़ेपन की बेड़ियाँ तोड़ चुका है।
आर्थिक सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर होते ग्रामीण
सड़कों के विस्तार ने केवल रास्तों को ही नहीं जोड़ा है, बल्कि ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में भी क्रांतिकारी बदलाव लाया है। कोलेंग और छिंदगुर जैसे गाँवों के सरपंचों का मानना है कि कनेक्टिविटी बेहतर होने से स्थानीय वनोपज और कृषि उत्पादों को सही बाजार मिलने लगा है।
पहले जहाँ बिचौलिये ओने-पौने दामों में सामान खरीद लेते थे, अब ग्रामीण स्वयं अपनी उपज लेकर सीधे मंडियों तक पहुँच रहे हैं। इससे न केवल उनकी आय में वृद्धि हुई है, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं। खेती-किसानी के साथ-साथ अब ग्रामीण व्यापार और स्वरोजगार की दिशा में भी कदम बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि विकास जब अंतिम छोर तक पहुँचता है, तो वह केवल सुविधा नहीं बल्कि स्वाभिमान भी लेकर आता है।
दहशत के साये से बाहर निकलती नई पीढ़ी
कोलेंग क्षेत्र में आई यह तब्दीली केवल बुनियादी ढाँचे तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ के लोगों की सोच और जीवनशैली में भी बड़ा सुधार देखने को मिल रहा है। माओवाद के प्रभाव में आई कमी के बाद अब युवाओं का रुझान शिक्षा और कौशल विकास की ओर बढ़ा है।
शासन की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का सीधा लाभ अब सीधे पात्र हितग्राहियों तक पहुँच रहा है, जिससे प्रशासन और जनता के बीच का अविश्वास खत्म हुआ है। जो ग्रामीण कभी सरकारी दफ्तरों के नाम से कतराते थे, वे आज विकास कार्यों में बढ़-चढ़कर अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर रहे हैं। संक्षेप में कहें तो बस्तर का यह कोना अब अपनी पुरानी और नकारात्मक पहचान को पीछे छोड़कर एक नई सुबह का स्वागत कर रहा है, जहाँ सिर्फ शांति और समृद्धि के लिए जगह है।


