सीजी भास्कर, 12 अप्रैल। आशा भोंसले का जाना एक ऐसी रिक्तता है जिसे कभी नहीं भरा जा सकता। उन्होंने अपनी आवाज़ के हर सुर में कभी चुलबुलापन, कभी दर्द, तो कभी रूहानी सुकून घोला।
कैबरे हो या गज़ल, शास्त्रीय संगीत हो या पॉप—आशा ताई ने हर विधा को अपना बनाया। उनका जाना सिर्फ एक गायिका का जाना नहीं, बल्कि संगीत के एक सुनहरे अध्याय का समापन है।
‘दम मारो दम’, ‘पिया तू अब तो आ जा’, और ‘ये मेरा दिल यार का दीवाना’—इन गीतों ने हिंदी सिनेमा में डिस्को और कैबरे को नई पहचान दी। उनकी आवाज़ में वो ऊर्जा थी जिसने डांस फ्लोर को हमेशा गुलज़ार रखा।
‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’, ‘दम भर जो उधर मुंह फेरे’, और ‘दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए’। इन गीतों में आशा ताई ने जिस गहराई और नज़ाकत का इस्तेमाल किया, वह केवल वही कर सकती थीं।
‘उमराव जान’ की गज़लें आज भी उनकी गायकी का शिखर मानी जाती हैं। उन्होंने अपनी आवाज़ से न केवल सुर लगाए, बल्कि शब्दों को ज़िंदा कर दिया।
आशा ताई सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, वह एक ‘म्यूजिकल स्कूल’ थीं। उन्होंने बिना किसी बंधन के संगीत के साथ प्रयोग किए। उनकी आवाज़ में वह लचीलापन था कि वे 70 साल की उम्र में भी उतनी ही युवा और ताज़ा लगती थीं जितनी कि करियर के शुरुआत में।
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। आपकी आवाज़ हमारे दिलों में हमेशा गूंजती रहेगी। भावभीनी श्रद्धांजलि!


