सीजी भास्कर, 27 अप्रैल : छत्तीसगढ़ के वन्यजीव इतिहास (Barnawapara Blackbuck Success) में एक ऐसा अध्याय लिखा गया है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। कभी जो इलाका काले हिरणों के लिए ‘कब्रिस्तान’ बन चुका था, आज वही बारनवापारा अभयारण्य इन खूबसूरत जीवों के कुलांचों से गुलजार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 133वें एपिसोड में छत्तीसगढ़ के इस बेमिसाल संरक्षण प्रयास की जमकर सराहना की है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने इस पर गर्व जताते हुए कहा कि यह राज्य की पर्यावरणीय दूरदर्शिता का ही परिणाम है कि विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके काले हिरणों को यहां नया जीवन मिला है।

शून्य से 200 तक का सफर
बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में फैला 245 वर्ग किलोमीटर का यह अभयारण्य (Barnawapara Blackbuck Success) आज एक मिसाल बन चुका है। एक समय ऐसा था जब अतिक्रमण और शिकार की वजह से बारनवापारा काले हिरणों से पूरी तरह खाली हो गया था। करीब पांच दशकों तक यहां एक भी काला हिरण नजर नहीं आया। लेकिन साल 2018 में राज्य वन्यजीव बोर्ड की बैठक के बाद जो मास्टर प्लान बना, उसने तस्वीर बदल दी। आज यहां करीब 200 काले हिरण (ब्लैकबक) सुरक्षित आवास में फल-फूल रहे हैं। जो क्षेत्र कभी सूना पड़ा था, वहां अब पुनर्जीवन की एक सशक्त कहानी लिखी जा रही है ।

चुनौतियों का पहाड़ और वैज्ञानिक मैनेजमेंट की जीत
यह रास्ता इतना आसान नहीं था। संरक्षण के शुरुआती चरण में जब निमोनिया जैसी बीमारियों ने हमला किया और आठ हिरणों (Barnawapara Blackbuck Success) की मौत हो गई, तो वन विभाग ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। बाड़ों में जलभराव रोकने के लिए रेत की परतें बिछाई गईं, ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त किया गया और चौबीसों घंटे निगरानी के लिए समर्पित पशु चिकित्सकों की फौज तैनात की गई। बेहतर पोषण और सुरक्षा मिलने के बाद इनकी आबादी ने जो रफ्तार पकड़ी, वह आज 200 के जादुई आंकड़े तक पहुंच गई है। यह सफलता भविष्य में इन्हें खुले जंगल में छोड़ने के लिए एक मजबूत आधार तैयार करती है ।

सर्पिलाकार सींगों वाले इन ‘ब्लैकबक्स’ का नया ठिकाना
काला हिरण (Antilope cervicapra) भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे राजसी और संकटग्रस्त मृग माना जाता है। नर काले हिरण (Barnawapara Blackbuck Success) के लंबे सर्पिलाकार सींग और उनका गहरा काला रंग उन्हें किसी योद्धा जैसा लुक देता है। दिन के उजाले में सक्रिय रहने वाली यह प्रजाति अब बारनवापारा के खुले घास के मैदानों में खुद को पूरी तरह अनुकूलित कर चुकी है। 75 सेंटीमीटर तक लंबे सींगों वाले इन नर हिरणों की सक्रियता इस बात का प्रमाण है कि अगर इंसान ठान ले, तो खोई हुई प्रकृति को फिर से लौटाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ का यह प्रयोग अब देश के अन्य राज्यों के लिए वन्यजीव संरक्षण का एक ‘मॉडल’ बनकर उभरा है ।


