सीजी भास्कर, 26 अप्रैल : बस्तर की धरती अब सिर्फ खनिज और जंगलों के लिए नहीं, बल्कि अपने ‘सफेद सोने’ यानी काजू के दम पर दुनिया फतह करने को तैयार है। अनुकूल जलवायु और उपजाऊ मिट्टी के संगम ने यहां ऐसी फसल तैयार की है, जिसने बिचौलियों के सिंडिकेट को तोड़कर सीधे ग्लोबल मार्केट में दस्तक दे दी है। बस्तर का यह आक्रामक व्यापारिक विस्तार (Bastar Cashew Industry) अब छत्तीसगढ़ की सीमाओं को लांघकर सात समंदर पार देश-विदेश के बाजारों तक पहुंच चुका है। कल तक जो आदिवासी केवल वनोपज पर निर्भर थे, आज वे अपनी मेहनत और काजू की खेती से आर्थिक समृद्धि की नई इबारत लिख रहे हैं।
10 हजार परिवारों ने छेड़ी आर्थिक जंग
बस्तर के बकावंड ब्लाक में काजू क्रांति का ऐसा सैलाब आया है कि अब यहां प्रतिवर्ष 50 हजार क्विंटल से भी अधिक काजू का उत्पादन हो रहा है। यह महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उन 10 हजार परिवारों की सफलता (Bastar Cashew Industry) की कहानी है, जिन्होंने पारंपरिक खेती छोड़ व्यावसायिक प्लांटेशन को अपनाया। प्रगतिशील किसानों का कहना है कि काजू का पेड़ महज 4-5 साल में नोट उगलने वाली मशीन बन जाता है। एक बार पेड़ तैयार हुआ तो रखरखाव का खर्च शून्य और मुनाफा सीधा किसानों की जेब में। अब ग्रामीण मांग कर रहे हैं कि सरकार निजी भूमि पर भी इस खेती को युद्धस्तर पर बढ़ावा दे।
स्वाद ऐसा कि दुनिया दीवानी
बस्तर का काजू अपनी बेजोड़ मिठास और ठोस बनावट के कारण नेशनल मार्केट के बड़े खिलाड़ियों को कड़ी टक्कर दे रहा है। बिना पॉलिश और बिना किसी मिलावट के मिलने वाला यह शुद्ध काजू स्वाद के मामले में अन्य राज्यों के ब्रांड्स को धूल चटा रहा है। यही वजह है कि मार्केट (Bastar Cashew Industry) में इसकी डिमांड में भारी उछाल आया है। जहाँ कच्चा काजू कौड़ियों के भाव बिकता था, वहीं अब प्रोसेसिंग के बाद इसकी कीमत 600 रुपये प्रति किलो के पार जा रही है। व्यापारियों की मानें तो बस्तर के काजू की चमक ने काजू के पारंपरिक गढ़ माने जाने वाले राज्यों की नींद उड़ा दी है।
प्रोसेसिंग यूनिट्स से महिलाओं का हल्ला बोल
सिर्फ खेती ही नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग के क्षेत्र में भी बस्तर ने अपनी ताकत दिखाई है। बकावंड की यूनिट्स में महिला स्व-सहायता समूहों ने कमान संभाल ली है, जिससे बिचौलियों का वर्चस्व पूरी तरह खत्म हो गया है। ‘बस्तर काजू’ के नाम से हो रही ब्रांडिंग ने स्थानीय महिलाओं को घर बैठे सम्मानजनक रोजगार दिया है। वन विभाग और उद्यानिकी विभाग के सहयोग (Bastar Cashew Industry) ने इस पूरे प्रोजेक्ट को एक पावरफुल इकोनॉमिक मॉडल में बदल दिया है। आज बस्तर का काजू सिर्फ एक ड्राई फ्रूट नहीं, बल्कि आदिवासियों के स्वाभिमान और सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।


