सीजी भास्कर, 05 अप्रैल। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जमीन विवादों और संपत्ति की खरीद-बरोख्त को लेकर एक ऐसा फैसला (Bilaspur High Court Decision) सुनाया है, जो उन लोगों के लिए बड़ी चेतावनी है जो बिना पूरी जांच-पड़ताल के विवादित जमीनें खरीदते हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर आप ऐसी जमीन का सौदा करते हैं जिसका मामला पहले से कोर्ट में लंबित (Sub-judice) है,
तो आपको अलग से पक्षकार बनाने या नोटिस देकर सुनने की कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है। आप सीधे तौर पर अपने विक्रेता के कानूनी अधिकारों के उत्तराधिकारी माने जाएंगे-यानी विक्रेता जीता तो आप जीते, और वह हारा तो आपकी करोड़ों की संपत्ति मिट्टी में मिल जाएगी।
क्या था 1.20 करोड़ की जमीन का पूरा विवाद? (Bilaspur High Court Decision)
मामला रायपुर के ग्राम टेमरी स्थित लगभग 0.376 हेक्टेयर जमीन से जुड़ा है। इस बेशकीमती जमीन को दीप्ति अग्रवाल नाम की महिला ने नवंबर 2025 में बहुरलाल साहू और यतिराम साहू से 1 करोड़ 20 लाख 28 हजार रुपये में खरीदा था।
पेच तब फंसा जब पता चला कि इस जमीन के मालिकाना हक को लेकर संजय कुमार नचरानी और साहू परिवार के बीच राजस्व न्यायालय में पहले से ही जंग चल रही थी। संजय नचरानी का दावा था कि उन्होंने यह जमीन 1997 में ही खरीद ली थी, लेकिन तकनीकी गड़बड़ी के चलते पोर्टल पर पुराना नाम दिखने लगा।
खरीदार की दलील: “मैं नेक नीयत हूं, मुझे क्यों नहीं सुना?”
विवाद के बीच राजस्व बोर्ड ने अपना फैसला सुना दिया, जिससे परेशान होकर खरीदार दीप्ति अग्रवाल हाईकोर्ट (Bilaspur High Court Decision) पहुंच गईं। उनकी दलील थी कि वे एक ‘बोनाफाइड परचेजर’ (नेक नीयत खरीदार) हैं और उन्होंने इतनी बड़ी रकम देकर जमीन ली है, इसलिए उन्हें बिना सुने कोई आदेश पारित करना उनके कानूनी अधिकारों का हनन है।
वहीं, विपक्षी पक्ष ने तर्क दिया कि जब सौदा हुआ, तब मामला कोर्ट में विचाराधीन था और विक्रेता खुद सिविल कोर्ट में केस लड़ रहे थे, ऐसे में खरीदार को अलग से सुनने की कोई जरूरत नहीं है।
जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की सख्त टिप्पणी
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने याचिका को खारिज (Bilaspur High Court Decision) कर दिया। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि “इतनी बड़ी राशि खर्च करने से पहले जमीन के रिकॉर्ड की गहराई से जांच करना खरीदार की जिम्मेदारी थी।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट’ की धारा 55 के तहत खरीदार को संपत्ति के दोषों और चल रहे मुकदमों की जानकारी खुद लेनी चाहिए। मुकदमेबाजी के दौरान निजी सौदों के जरिए कोर्ट की शक्तियों को कम नहीं किया जा सकता।


