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Home » CG Rice Milling Modernization : राइस मिलर्स बनाम सरकार! ‘इम्प्रूव्ड राइस स्कीम’ पर घमासान

CG Rice Milling Modernization : राइस मिलर्स बनाम सरकार! ‘इम्प्रूव्ड राइस स्कीम’ पर घमासान

By Newsdesk Admin
28/05/2026
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CG Rice Milling Modernization
CG Rice Milling Modernization

सीजी भास्कर, 28 मई : छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े उद्योग और अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले राइस मिलिंग सेक्टर (CG Rice Milling Modernization)  में इस वक्त एक ऐसा प्रशासनिक और तकनीकी भूचाल आया है, जिसने मिलर्स से लेकर सरकार तक की नींद उड़ा दी है। भारत सरकार की नवीन और अत्यंत महत्वाकांक्षी ‘इम्प्रूव्ड राईस स्कीम’ को छत्तीसगढ़ में प्रभावी ढंग से लागू करने की दिशा में राजधानी रायपुर के न्यू सर्किट हाउस, सिविल लाइंस में एक ऐसी हाई-प्रोफाइल और तीखी राज्य स्तरीय कार्यशाला संपन्न हुई, जिसकी चर्चा अब पूरे प्रदेश के व्यापारिक गलियारों में हो रही है।

Contents
  • मिलर्स के उड़ाए होश
  • सचिव का कड़ा रुख और मिलर्स की तीन बड़ी व्यावहारिक मांगें
  • पर्दे के पीछे का सस्पेंस

खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले की अध्यक्षता में बुलाई गई इस एक दिवसीय आपात बैठक में जो फैसले लिए गए और मिलर्स ने जिस आक्रामक तेवर में अपनी व्यावहारिक दिक्कतें सामने रखीं, उसने साफ कर दिया है कि छत्तीसगढ़ में (CG Rice Milling Modernization) की यह राह इतनी आसान नहीं होने वाली है, जितनी सरकारी फाइलों में नजर आती है।

इस योजना को लेकर मिलिंग उद्योग के भीतर भारी संशय और सस्पेंस का माहौल बना हुआ है। धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में हर साल करोड़ों मीट्रिक टन धान की मिलिंग होती है, लेकिन केंद्र सरकार के नए कड़े नियमों ने मिलर्स के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है।

इसी गंभीर मोड़ पर आयोजित कार्यशाला में प्रदेशभर से आए राइस मिल एसोसिएशन के प्रतिनिधियों, भारतीय खाद्य निगम (FCI), मार्कफेड और खाद्य विभाग के शीर्ष अधिकारियों के बीच घंटों मैराथन बहस चली। सचिव ने दोटूक शब्दों में साफ कर दिया कि भारत सरकार आगामी खरीफ वर्ष से इस योजना को हर हाल में और सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ लागू करने जा रही है, इसलिए मिलों को आधुनिक बनाना और गुणवत्ता में सुधार करना अब मजबूरी बन चुका है, जो इस पूरे मिशन (CG Rice Milling Modernization) का सबसे बड़ा और कड़ा आधार है।

मिलर्स के उड़ाए होश

इस पूरी कार्यशाला में सबसे बड़ा सस्पेंस और विवाद का विषय केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए चावल की गुणवत्ता के कड़े और नए मापदंड रहे। खाद्य विभाग के अधिकारियों ने जब प्रोजेक्टर और प्रस्तुतिकरण (पीपीटी) के माध्यम से नए नियमों का खुलासा किया, तो हॉल में सन्नाटा पसर गया। नए नियमों के मुताबिक, अब मिलर्स को केवल 10 प्रतिशत अरवा ब्रोकन (टूटा हुआ) चावल और मात्र 5 प्रतिशत उसना ब्रोकन चावल के कड़े और निर्धारित मानकों के तहत ही सरकारी चावल की सप्लाई करनी होगी। इस तकनीकी गणित को सुनते ही मिलर्स भड़क उठे, क्योंकि छत्तीसगढ़ में वर्तमान मिलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ इस मानक को हासिल करना लगभग नामुमकिन माना जा रहा है। अधिकारियों ने दोटूक कहा कि यदि इस मानक का पालन नहीं हुआ, तो चावल का उठाव नहीं किया जाएगा, जिससे (CG Rice Milling Modernization) को लेकर मिलर्स के भीतर भारी आक्रोश पनप गया है।

राइस मिलर्स का साफ तौर पर कहना है कि छत्तीसगढ़ में उत्पादित होने वाली धान की कुछ किस्मों की प्रकृति ऐसी होती है कि मिलिंग के दौरान ब्रोकन का प्रतिशत अपने आप बढ़ जाता है। ऐसे में बिना मिलों के पूर्ण आधुनिकीकरण और भारी-भरकम पूंजी निवेश के इन मानकों को पूरा करना घाटे का सौदा साबित होगा। कार्यशाला में खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 से लागू होने वाले इस स्कीम के विभिन्न कड़े प्रावधानों, सख्त भंडारण व्यवस्था, अनुबंध प्रक्रिया, बढ़ती लागत और क्रियान्वयन संबंधी पेचीदा विषयों पर विस्तार से बिंदुवार चर्चा की गई। मिलर्स ने साफ चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने उनकी व्यावहारिक समस्याओं को समझे बिना जबरन इस योजना को थोपने का प्रयास किया, तो आगामी सीजन में मिलिंग का पूरा काम ठप हो सकता है, जिससे उत्पन्न होने वाले आर्थिक (CG Rice Milling Modernization) को संभालना शासन के लिए एक बड़ी अग्निपरीक्षा होगी।

सचिव का कड़ा रुख और मिलर्स की तीन बड़ी व्यावहारिक मांगें

इस तीखी बहस के बीच खाद्य सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले ने बेहद आक्रामक और रणनीतिक रुख अपनाते हुए स्थिति को संभालने का प्रयास किया। उन्होंने मिलर्स को स्पष्ट शब्दों में आईना दिखाते हुए कहा कि देश और वैश्विक बाजार में छत्तीसगढ़ के चावल की साख बचाने के लिए मिलों को निर्धारित मानकों के अनुरूप तकनीकी रूप से अपग्रेड करना ही एकमात्र रास्ता बचा है। हालांकि, उन्होंने मिलर्स को यह भरोसा भी दिलाया कि राज्य सरकार उनके हितों की अनदेखी नहीं होने देगी।

सचिव ने आश्वस्त किया कि मिलर्स द्वारा दिए गए सभी तार्किक सुझावों और व्यावहारिक समस्याओं का पूरी तरह से सूक्ष्म परीक्षण किया जाएगा और इसके बाद एक मजबूत व संतुलित प्रस्ताव तैयार कर भारत सरकार को अंतिम निर्णय के लिए भेजा जाएगा, जो इस विवाद (CG Rice Milling Modernization) को सुलझाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।

बैठक के दौरान छत्तीसगढ़ राईस मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष कान्ति लाल बोथरा, महामंत्री विष्णु बिंदल और कोषाध्यक्ष रमेश अग्रवाल सहित उपस्थित लगभग 60 से अधिक दिग्गजों ने सरकार के सामने अपनी तीन सबसे बड़ी और प्रमुख मांगें रखीं। पहली मांग यह कि प्रदेश में उन्नत और ऐसी धान किस्मों की खेती को बढ़ावा दिया जाए जिससे मिलिंग के दौरान चावल टूटे नहीं। दूसरी बड़ी मांग भारतीय खाद्य निगम (FCI) में रैक मूवमेंट को अत्यधिक तेज करने की है, ताकि मिलों में तैयार चावल का उठाव समय पर हो सके और मिलर्स का पैसा न फंसे। और तीसरी सबसे महत्वपूर्ण मांग मिलिंग लागत (कस्टम मिलिंग चार्ज) में आनुपातिक वृद्धि करने की रही, क्योंकि नई तकनीक अपनाने से मिलर्स का खर्च कई गुना बढ़ने जा रहा है। मिलर्स ने साफ किया कि इन आधारभूत सुविधाओं को मजबूत किए बिना योजना धरातल पर दम तोड़ देगी, जो (CG Rice Milling Modernization) की सबसे बड़ी व्यावहारिक सच्चाई है।

पर्दे के पीछे का सस्पेंस

इस पूरे हाई-वोल्टेज ड्रामे और वैचारिक मतभेदों के बावजूद, कार्यशाला के अंत में एक बेहद दिलचस्प मोड़ देखने को मिला। राइस मिल एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने इस बात के लिए खाद्य सचिव का सहृदय आभार व्यक्त किया कि उन्होंने इस कड़े कानून को सीधे थोपने के बजाय, योजना को लागू करने से पहले मिलर्स के साथ बैठकर संवाद स्थापित करने का लोकतांत्रिक और सराहनीय प्रयास किया।

एसोसिएशन ने मंच से यह भरोसा भी दिलाया कि यदि सरकार उनकी मिलिंग लागत और तकनीकी अपग्रेडेशन में वित्तीय मदद जैसे मुद्दों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करती है, तो वे इस महत्वाकांक्षी योजना के सफल क्रियान्वयन में शासन का पूरा सहयोग करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। यह लचीला रुख इस बात का संकेत है कि पर्दे के पीछे कोई बीच का रास्ता निकालने की तैयारी चल रही है ताकि भविष्य में किसी भी बड़े आर्थिक (CG Rice Milling Modernization) को टाला जा सके।

इस ऐतिहासिक कार्यशाला में मार्कफेड के प्रबंध संचालक (MD) जितेन्द्र शुक्ला और भारतीय खाद्य निगम के महाप्रबंधक (GM) दीपक शर्मा सहित खाद्य विभाग के तमाम आला अफसर भी मौजूद थे, जिन्होंने मिलर्स के हर एक तकनीकी सवाल का जवाब दिया। अब सबसे बड़ा सस्पेंस यह है कि क्या केंद्र सरकार छत्तीसगढ़ के राइस मिलर्स की इन मांगों को स्वीकार कर नियमों में कुछ ढील देगी? या फिर आगामी खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 में छत्तीसगढ़ के मिलर्स और सरकार के बीच एक नया और बड़ा टकराव देखने को मिलेगा? बहरहाल, सचिव के इस हंटर ने यह तो साफ कर दिया है कि छत्तीसगढ़ में अब चावल की मिलिंग पारंपरिक ढर्रे पर नहीं होगी। आने वाले कुछ महीने छत्तीसगढ़ के कृषि और उद्योग जगत के लिए बेहद संवेदनशील होने वाले हैं, जहां तकनीकी विकास (CG Rice Milling Modernization) की यह नई बयार या तो मिलों को आधुनिक बनाएगी या फिर एक नए व्यापारिक संकट को जन्म देगी।

 

 

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