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Home » Deaf Mute Testimony Case: मूक-बधिर की गवाही बनी मजबूत सबूत, हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा बरकरार रखी

Deaf Mute Testimony Case: मूक-बधिर की गवाही बनी मजबूत सबूत, हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा बरकरार रखी

By Newsdesk Admin
27/03/2026
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Deaf Mute Testimony Case: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि केवल मूक-बधिर होने के आधार पर किसी गवाह की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि संकेतों के माध्यम से दी गई जानकारी भी कानूनी रूप से वैध मौखिक साक्ष्य मानी जाएगी। कोर्ट ने इस पूरे मामले को (Legal Evidence) के नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण बताया।

Contents
  • ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार, आरोपी को राहत नहीं
  • घर में अकेली युवती के साथ हुई वारदात
  • इशारों और गुड़िया के जरिए दर्ज हुई गवाही
  • मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट ने मजबूत किया केस
  • न्याय के लिए संवेदनशील दृष्टिकोण जरूरी

ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार, आरोपी को राहत नहीं

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। आरोपी को आईपीसी की धारा 376(2) के तहत मौत होने तक जेल और धारा 450 के तहत 5 साल अतिरिक्त सजा सुनाई गई है, साथ ही 21 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। इस फैसले को (Justice Delivered) के रूप में देखा जा रहा है।

घर में अकेली युवती के साथ हुई वारदात

पूरा मामला बालोद जिले के अर्जुंदा थाना क्षेत्र का है, जहां 29 जुलाई 2020 को 20 वर्षीय मूक-बधिर युवती घर में अकेली थी। इसी दौरान रिश्तेदार नीलम कुमार देशमुख घर में घुसा और उसके साथ दुष्कर्म कर फरार हो गया। शाम को जब मां घर लौटी, तो पीड़िता ने इशारों में पूरी घटना बताई, जिसके बाद मामला दर्ज किया गया।

इशारों और गुड़िया के जरिए दर्ज हुई गवाही

पीड़िता के बोल और सुन नहीं पाने के कारण कोर्ट के सामने गवाही दर्ज करना चुनौतीपूर्ण था। ट्रायल के दौरान साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट की मदद ली गई, वहीं कुछ जटिल सवालों के जवाब समझने के लिए प्लास्टिक की गुड़िया का इस्तेमाल किया गया। पीड़िता ने इसी माध्यम से पूरी घटना को स्पष्ट किया, जिसे कोर्ट ने (Sign Language Evidence) के रूप में स्वीकार किया।

मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट ने मजबूत किया केस

मामले में केवल गवाही ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सबूत भी निर्णायक साबित हुए। जांच के दौरान पीड़िता के स्लाइड्स और आरोपी के कपड़ों पर मानव शुक्राणु पाए गए, जिसकी पुष्टि मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट से हुई। आरोपी इस संबंध में कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका, जिससे मामला और मजबूत हुआ। इसे (Forensic Evidence) के तौर पर अहम माना गया।

न्याय के लिए संवेदनशील दृष्टिकोण जरूरी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि न्याय व्यवस्था को हर वर्ग के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, खासकर उन लोगों के लिए जो अपनी बात सामान्य तरीके से नहीं रख सकते। इशारों से दी गई गवाही को नजरअंदाज करना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

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