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Home » Divya Pravchan in Bhilai : “ईश्वर को जान कर ही कोई जीव माया से पार हो सकता है” – श्रीश्वरी देवी के दिव्य दार्शनिक प्रवचन में उमड़े भक्त

Divya Pravchan in Bhilai : “ईश्वर को जान कर ही कोई जीव माया से पार हो सकता है” – श्रीश्वरी देवी के दिव्य दार्शनिक प्रवचन में उमड़े भक्त

By Newsdesk Admin
07/01/2026
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सीजी भास्कर, 07 जनवरी। वैशाली नगर कालीबाड़ी प्रांगण में पंचम मूल जगद्गुरु स्वामी कृपालुजी महाराज की प्रचारिका सुश्री श्रीश्वरी देवी के दिव्य प्रवचन में हर रोज शाम 6 से 8 बजे तक बड़ी संख्या में दार्शनिक भक्त पहुंच रहे हैं। (Divya Pravchan in Bhilai)

Contents
  • दिव्य दार्शनिक प्रवचन के दूसरे दिन –
  • Divya Pravchan in Bhilai : हम आनंद ही क्यों चाहते हैं?
  • आनंद की परिभाषा क्या है?
  • दिव्य दार्शनिक प्रवचन के तीसरे दिवस –
  • Divya Pravchan in Bhilai : किंतु हम ईश्वर को कैसे जाने?
  • पुनः वेद–शास्त्रों से प्रमाण देते हुए उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि भगवान को एक गधा भी जान सकता है लेकिन कैसे?

5 जनवरी से 14 दिन के लिए हो रहे इस आयोजन में जीवन दर्शन और भगवत प्राप्ति मार्ग से सदा–सदा के लिए जीवन को आनंदमयी बनाने के गूढ़ ज्ञान से ओत प्रोत इस प्रवचन में समूचे छत्तीसगढ़ से भक्तजन आ रहे हैं।

दिव्य दार्शनिक प्रवचन के दूसरे दिन –

विश्व के पंचम मूल जगद्गुरु स्वामी श्री कृपालुजी महाराज की प्रचारिका सुश्री श्रीश्वरी देवी ने कहा कि विश्व का प्रत्येक जीव आनंद की प्राप्ति हेतु ही प्रतिक्षण प्रयत्नशील है और कोई भी जीव एक क्षण के लिए भी अकर्मा नही रह सकता।

आनंद प्राप्ति ही हमारा लक्ष्य है, अतएव दिन भर मे जितने विपरीत कार्य हम करते हैं केवल आनंद के लिए ही करते हैं।

Divya Pravchan in Bhilai : हम आनंद ही क्यों चाहते हैं?

इसके उत्तर में उन्होंने कहा चुंकि विश्व का प्रत्येक जीव भगवान का अंश है, भगवान अंशी है, साथ ही साथ प्रत्येक अंश अपने अंशी से ही स्वभाविक रूपेण प्यार करता है। अतः विश्व का प्रत्येक जीव भी अपने अंशी भगवान से ही स्वभाविक रूप से प्यार करता है।

भगवान स्वयं आनंद है, भगवान एवं आनंद पर्यायवाची शब्द है, अतः विश्व का प्रत्येक जीव आनंद से ही प्यार करता है।

आनंद की परिभाषा क्या है?

वेद कहता है “यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं” अर्थात आनंद सदा अनंत मात्रा का होता है, अनंत काल के लिए मिला है।आनंद चुंकि भगवान का पर्यायवाची शब्द है अतएव ऐसा आनंद एक बार ही मिल जाए किसी को फिर छिना नहीं करता, अपितु वो निरंतर बढ़ता ही जाता है।

लेकिन ऐसा आनंद हमें आज तक प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि जो संसारी वस्तुओं से हमें जिस आनंद की प्राप्ति होती है, वो तो क्षणभंगुर होता है। कुछ क्षण पश्चात आनंद दुख में परिवर्तित हो जाता है। अतः यह आनंद नहीं है, जो हमें संसार से मिलता है। आनंद स्वयं भगवान हैं अतः भगवत प्राप्ति पर ही हम सदा–सदा के लिए आनंदमय हो सकते हैं।


दिव्य दार्शनिक प्रवचन के तीसरे दिवस –

सुश्री श्रीश्वरी देवी जी ने बताया कि ईश्वर को जानकर ही कोई जीव माया से पार हो सकता है, इसका अन्य कोई मार्ग नहीं है।

Divya Pravchan in Bhilai : किंतु हम ईश्वर को कैसे जाने?

इसके उत्तर में दीदीजी ने वेदों–शास्त्रों से ढेरों प्रमाण देते हुए यह बताया कि ईश्वर को कोई जान ही नहीं सकता, क्योंकि ईश्वर इंद्रिय, मन एवं बुद्धि से परे है ।

हमारी इंद्रीय, मन एवं बुद्धि प्राकृत है एवं भगवान दिव्य हैं। अतः प्राकृत इंद्रिय, मन एवं बुद्धि दिव्य भगवान को भला कैसे ग्रहण कर सकती है। साथ ही साथ भगवान इंद्रिय, मन एवं बुद्धि के प्रेरक है, प्रकाशक है, धारक है, ज्ञाता है, एवं सर्वज्ञ है और हम जीव अल्पज्ञ है, इसलिए भगवान को नहीं जाना जा सकता।

https://www.facebook.com/share/r/1AkHYiEH8F

पुनः वेद–शास्त्रों से प्रमाण देते हुए उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि भगवान को एक गधा भी जान सकता है लेकिन कैसे?

जिस पर कृपा हो जाये वही भाग्यशाली जीव उस भगवान को जान सकता है। केवल साधन के बल पर हम भगवान को नहीं जान सकते, भगवतकृपा आवश्यक है।

लेकिन यह कृपा (भगवत्कृपा) जिसके द्वारा हम भगवान को जान सकते हैं, वह कृपा कैसे प्राप्त होगी?

इसका उत्तर‌ 8 जनवरी वृहस्पतिवार के चौथे दिवस के प्रवचन में दिया जायेगा।

https://www.instagram.com/reel/DTIj_8_DtwB/?igsh=amN3bjNuMHR0Yzgz

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