सीजी भास्कर, 27 जनवरी। झूठे मामले में फंसाकर जेल भेजे जाने और विद्वेषपूर्ण कार्रवाई के खिलाफ दायर वाद में न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने पीड़ित को दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देने का आदेश जारी करते हुए रिपोर्टकर्ता और तत्कालीन थाना प्रभारी को संयुक्त रूप से दोषी ठहराया है। यह आदेश 14 वर्षों तक चले संघर्ष के बाद सामने आया है।
मामला पूर्व पार्षद एवं सामाजिक कार्यकर्ता पंकज साहू से जुड़ा है। वे वर्ष 2010 से 2015 तक नगर पालिका परिषद महासमुंद में पार्षद (False Case Police Action) रहे। इस दौरान उन्होंने तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष द्वारा किए जा रहे कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई थी। हार्वेस्टर से पानी पिलाने के फर्जी प्रकरण, नलकूप खनन और राशन कार्ड घोटाले जैसे मामलों में उन्होंने अध्यक्ष, सीएमओ और अन्य अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतें दर्ज करवाई थीं।
आरोप है कि इन्हीं कार्रवाइयों से नाराज होकर 11 अक्टूबर 2012 को कचहरी चौक स्थित पंकज साहू के होटल में अवैध रूप से तोड़फोड़ और लूटपाट की गई, जिसमें उन्हें गंभीर चोट आई और हाथ फ्रैक्चर हो गया। साहू ने इस घटना की एफआईआर दर्ज कराई और जिला अस्पताल में चिकित्सकीय परीक्षण कराया।
इसी दौरान, सीएमओ की पत्नी द्वारा पंकज साहू, उनके पिता फूलचंद साहू, भाई और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ सीएमओ आवास में तोड़फोड़ और मारपीट का झूठा मामला दर्ज कराया गया। इस प्रकरण में पंकज साहू और उनके परिजनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जहां वे छह दिन तक निरुद्ध रहे। बाद में जमानत पर रिहा हुए।
लंबी सुनवाई के बाद वर्ष 2019 में न्यायालय ने पंकज साहू सहित सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। दोषमुक्ति के बाद साहू ने गृह विभाग और पुलिस महानिरीक्षक से शिकायत कर तत्कालीन थाना प्रभारी, वर्तमान में डीएसपी प्रमिला मंडावी, के खिलाफ विभागीय जांच की मांग की। जांच में उन्हें झूठे प्रकरण में कार्रवाई का दोषी पाया गया और विभागीय दंड भी दिया गया।
इसके बाद वर्ष 2022 में पंकज साहू ने महासमुंद न्यायालय में विद्वेषपूर्ण अभियोजन और झूठे मामले में जेल भेजे जाने को लेकर दो लाख रुपये क्षतिपूर्ति का वाद (False Case Police Action) दायर किया। इस वाद में रिपोर्टकर्ता चमेली देशलहरा और पुलिस अधिकारी प्रमिला मंडावी को प्रतिवादी बनाया गया।
न्यायालय ने 15 जनवरी 2026 को आदेश पारित करते हुए दोनों प्रतिवादियों को संयुक्त रूप से दो लाख रुपये क्षतिपूर्ति राशि अदा करने का निर्देश दिया। साथ ही वाद में जमा किया गया न्याय शुल्क भी वादी को वापस करने के आदेश दिए गए हैं।
फैसले के बाद पंकज साहू ने कहा कि “सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं। यह निर्णय उन सभी लोगों के लिए संदेश है, जो पुलिसिया दुरुपयोग और झूठे आरोपों (False Case Police Action) से डरते हैं। संविधान ने जो अधिकार दिए हैं, उनके तहत न्याय जरूर मिलता है।” यह फैसला न केवल एक व्यक्ति को मिला न्याय है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कानून के दुरुपयोग पर आखिरकार जवाबदेही तय हो सकती है।


