सीजी भास्कर 30 दिसम्बर Gig Workers Strike India : 31 दिसंबर को देशभर में फूड और ग्रोसरी डिलीवरी से जुड़े गिग वर्कर्स काम रोकने की तैयारी में हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर लाखों डिलीवरी पार्टनर्स का कहना है कि लंबे समय से उनकी मेहनत और जोखिम के मुकाबले कमाई लगातार घटाई जा रही है। नए साल से ठीक पहले यह नाराजगी अब खुले विरोध में बदलती दिख रही है.
घंटों की मेहनत, मगर जेब में सिर्फ सैकड़ों रुपये
गिग वर्कर्स के अनुसार, 7 से 8 घंटे तक लगातार डिलीवरी करने के बाद भी रोज़ाना की कमाई कई बार 400 से 500 रुपये तक सिमट जाती है। खर्च, ईंधन और मेंटेनेंस निकालने के बाद हाथ में बहुत कम पैसा बचता है। हालात ऐसे हैं कि घर चलाने के लिए 15 से 18 घंटे तक ऑन-रोड रहना मजबूरी बन चुका है.
दूरी बढ़ी, पेमेंट घटा, इंसेंटिव हुआ अनिश्चित
वर्कर्स का आरोप है कि पहले कम दूरी की डिलीवरी पर भी संतोषजनक भुगतान मिलता था, लेकिन अब दूरी बढ़ने के बावजूद रेट घटा दिए गए हैं। इंसेंटिव सिस्टम स्थिर नहीं है, बोनस कब मिलेगा इसका कोई भरोसा नहीं। कई डिलीवरी पार्टनर्स इसे “काम ज्यादा, भरोसा कम” वाला मॉडल बता रहे हैं .
हादसा हुआ तो न इलाज, न बीमा
तेज़ डिलीवरी के दबाव में सड़क हादसों का जोखिम बढ़ गया है। वर्कर्स का कहना है कि दुर्घटना की स्थिति में न तो इलाज की गारंटी है और न ही पुख्ता इंश्योरेंस सपोर्ट। जाम में फंसने पर ग्राहकों की नाराजगी और समय सीमा का दबाव हालात को और मुश्किल बना देता है.
पिछली हड़ताल का असर अब भी ताज़ा
25 दिसंबर को हुई हड़ताल के बाद कई शहरों में डिलीवरी नेटवर्क की रफ्तार धीमी पड़ गई थी। खासकर शहरी इलाकों में फूड और ग्रोसरी ऑर्डर्स प्रभावित हुए। कुछ व्यापारियों का कहना है कि ऑनलाइन ऑर्डर पर निर्भर बिक्री में 70 से 80 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई थी.
उपभोक्ता भी सवाल पूछ रहे
ग्राहकों के बीच भी यह सवाल उठने लगा है कि जब प्लेटफॉर्म डिलीवरी चार्ज पूरा वसूलते हैं, तो उसका लाभ डिलीवरी करने वालों तक क्यों नहीं पहुंचता। त्योहारी सीजन और न्यू ईयर जैसे मौकों पर हड़ताल से आम लोगों की परेशानी बढ़ने की आशंका है
क्या हैं गिग वर्कर्स की मुख्य मांगें
गिग वर्कर्स का कहना है कि वे सिर्फ स्थायी नौकरी नहीं, बल्कि न्यूनतम सुरक्षा चाहते हैं। उनकी मांगों में दूरी और समय के हिसाब से उचित भुगतान, पारदर्शी इंसेंटिव सिस्टम, हेल्थ कवर और बीमा जैसी बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं। असंगठित ढांचे के कारण एकजुटता की कमी का फायदा कंपनियां उठा रही हैं.
करोड़ों लोगों की सुविधा, मगर सुरक्षा अधूरी
देश में अनुमानित 80 लाख से अधिक गिग वर्कर्स डिलीवरी, लॉजिस्टिक्स और राइड-शेयरिंग जैसे सेक्टर में सक्रिय हैं। यह मॉडल लचीलापन तो देता है, लेकिन न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा को लेकर अब भी स्पष्ट नियमों का अभाव है। 31 दिसंबर की हड़ताल इस पूरे सिस्टम पर नई बहस छेड़ सकती है.


