सीजी भास्कर, 20 सितंबर। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एफआईआर और पुलिस दस्तावेजों में अभियुक्तों की जाति दर्ज करने की प्रथा को (Judicial Reform in India) तत्काल समाप्त करने का आदेश दिया। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की बेंच ने इसे संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह प्रथा सामाजिक प्रोफाइलिंग और भेदभाव को बढ़ावा देती है, जो भारत के लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती है।
शराब तस्करी मामले की सुनवाई में आया बड़ा आदेश
यह फैसला शराब तस्करी से जुड़े एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान आया। याची प्रवीण छेत्री ने अपने खिलाफ दर्ज केस को रद्द करने की मांग की थी। मामला जसवंत नगर थाना, इटावा का था। पुलिस ने 29 अप्रैल 2023 को स्कॉर्पियो गाड़ी से 106 बोतल अवैध व्हिस्की बरामद की थी। जब्ती मेमो में अभियुक्तों की जाति जैसे माली, पहाड़ी राजपूत और ठाकुर दर्ज की गई थी। एक अन्य वाहन से 254 बोतल शराब बरामद की गई और उसके मालिक की पहचान पंजाबी पाराशर और ब्राह्मण जाति के रूप में दर्ज की गई। कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि पुलिस जाति आधारित पहचान का उल्लेख क्यों करती है, जबकि आधुनिक युग में पहचान के लिए बायोमेट्रिक और डिजिटल साधन उपलब्ध हैं।
पुलिस को व्यापक सुधार के निर्देश
हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस दस्तावेजीकरण प्रक्रियाओं में बड़े सुधार की जरूरत है। अदालत ने निर्देश दिया कि सभी आधिकारिक फॉर्म जैसे अपराध विवरण फॉर्म, गिरफ्तारी मेमो, कोर्ट सरेंडर मेमो और पुलिस अंतिम रिपोर्ट से जाति से संबंधित सभी कॉलम हटाए जाएं। इसके साथ ही थानों में लगे नोटिस बोर्ड पर अभियुक्तों के नाम के सामने दर्ज जाति का कॉलम भी तुरंत मिटाया जाए।
जातिगत पहचान पर तीखी टिप्पणी
कोर्ट ने डीजीपी के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि जाति का उल्लेख करना संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन है। न्यायमूर्ति दिवाकर ने टिप्पणी की कि यह प्रवृत्ति न केवल अभियुक्तों के लिए बल्कि समाज के लिए भी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक नुकसानदायक है। उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत के विजन को साकार करने के लिए जातिगत पहचान और महिमामंडन का अंत होना चाहिए।
वाहनों और इंटरनेट पर भी लगेगा प्रतिबंध
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में संशोधन कर वाहनों पर लिखे जाति आधारित नारों और पहचानकर्ताओं पर रोक लगाई जाए। साथ ही, इंटरनेट मीडिया पर जाति का महिमामंडन करने वाली या घृणा फैलाने वाली सामग्री पर सख्त कार्रवाई की जाए। इसके लिए आईटी नियमों को और मजबूत करने की बात कही गई।
अनुपालन के सख्त आदेश
कोर्ट ने रजिस्ट्रार अनुपालन को निर्देश दिया कि आदेश की प्रति प्रदेश शासन के मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री को भेजी जाए। साथ ही, अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक को तत्काल प्रभाव से आदेश का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया। आदेश की एक प्रति केंद्रीय गृह सचिव, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के सचिव, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को भी भेजने के निर्देश दिए गए।
समाज पर दूरगामी असर
इस फैसले को सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश पुलिस और प्रशासनिक दस्तावेजों में जातिगत पहचान को खत्म कर एक अधिक समावेशी और संवैधानिक लोकतंत्र की ओर ले जाएगा।


