सीजी भास्कर, 30 मई : दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण राज्य कर्नाटक में सत्ता की चाबी हाथ में आते ही कांग्रेस पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री (डिप्टी सीएम) पद की मलाई को लेकर एक बेहद आक्रामक, खौफनाक और आत्मघाती घमासान छिड़ गया है। कर्नाटक की सत्ता पर काबिज होने की तैयारियों के बीच प्रदेश के दो सबसे बड़े और रसूखदार समुदायों दलित और लिंगायत ने सीधे दिल्ली आलाकमान के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है।
दोनों समुदायों के शीर्ष नेताओं और धर्मगुरुओं ने सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे को साफ शब्दों में दोटूक चेतावनी दे डाली है कि अगर इस बार उनकी मांगों को अनसुना किया गया, तो आगामी चुनावों में कांग्रेस को ऐसा तगड़ा झटका दिया जाएगा कि पार्टी उबर नहीं पाएगी। इस अप्रत्याशित और आंतरिक बगावत (Karnataka Congress Crisis) के कारण बेंगलुरू से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस के रणनीतिकारों के माथे पर पसीना आ गया है।
दरअसल, यह पूरा विवाद केवल एक पद का नहीं है, बल्कि यह कर्नाटक के कड़े जातीय समीकरणों और भविष्य के वोट बैंक पर कब्जा जमाने का एक बहुत बड़ा और हिडन सस्पेंस है। शनिवार को यह बवाल उस समय सातवें आसमान पर पहुंच गया जब केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर सैकड़ों मादारा महासभा और दलित संगठनों के कार्यकर्ताओं ने आक्रामक प्रदर्शन करते हुए ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) के कर्नाटक प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला का घेराव कर दिया। उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री के. एच. मुनियप्पा को तत्काल डिप्टी सीएम घोषित करने की मांग को लेकर भारी नारेबाजी की। इस बड़े सियासी बवाल (Karnataka Congress Crisis) ने कांग्रेस के भीतर मचे आंतरिक कलह की पोल खोलकर रख दी है।
हमारे दम पर जीते और हमें ही ठेंगा!
बेंगलुरू एयरपोर्ट पर जुटे आक्रोशित प्रदर्शनकारियों ने कांग्रेस नेतृत्व के सामने अपना कड़ा पक्ष रखते हुए कहा कि राज्य में मादिगा (दलित) समुदाय की आबादी अच्छी-खासी होने के बावजूद पार्टी ने हमेशा उनके साथ सौतेला व्यवहार किया है। आज तक इतिहास में इस समुदाय को न तो मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली, न डिप्टी सीएम का पद और न ही कर्नाटक कांग्रेस (KPCC) का अध्यक्ष बनाया गया। इस अमानवीय और राजनीतिक उपेक्षा के ढर्रे को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
दलित नेताओं ने बेहद कड़े लहजे में सुरजेवाला को मेमोरेंडम सौंपते हुए कहा कि यदि इस बार के. एच. मुनियप्पा के नाम पर मुहर नहीं लगी, तो दलित समाज आने वाले समय में कांग्रेस को उसकी असली औकात दिखाने के लिए मजबूर हो जाएगा। इस आक्रामक अंदाज (Karnataka Congress Crisis) ने पूरी चयन प्रक्रिया को एक गहरे संकट में डाल दिया है, क्योंकि कांग्रेस का पूरा थिंक टैंक इस बात को अच्छे से जानता है कि दलित वोट बैंक खिसकने का मतलब राज्य में सत्ता का पूरी तरह से पतन होना है।
मैदान में उतरे लिंगायत संत
इस गहरे सियासी सस्पेंस में एक और बड़ा आक्रामक धमाका तब हुआ जब दलितों की बगावत के समानांतर राज्य का सबसे शक्तिशाली लिंगायत समुदाय भी अपनी हिस्सेदारी मांगने सड़क पर उतर आया। परम पूज्य लिंगायत संत गुरु बसव पट्टदेवरू और उनके हजारों समर्थकों ने कांग्रेस के सीनियर और कद्दावर नेता ईश्वर खंद्रे को डिप्टी सीएम बनाने की मांग पुरजोर तरीके से उठा दी है। लिंगायत संत ने तो सीधे तौर पर कांग्रेस हाईकमान को शाप देते हुए कड़ा अल्टीमेटम दिया है कि पिछले चुनाव में लिंगायत समाज ने बीजेपी का साथ छोड़कर एक कड़ा नियम (Karnataka Congress Crisis) अपनाते हुए कांग्रेस की झोली भरी थी, लेकिन अगर इस बार ईश्वर खंद्रे की अनदेखी हुई तो पूरा लिंगायत समाज अगले चुनाव में कांग्रेस को राज्य में मुंह दिखाने लायक भी नहीं छोड़ेगा।
अब शनिवार की शाम होने वाली कांग्रेस लेजिस्लेटिव पार्टी (CLP) की महाबैठक से पहले बेंगलुरू के पांच सितारा होटल में सस्पेंस और तनाव का माहौल चरम पर पहुंच चुका है। पार्टी के संकटमोचक के. सी. वेणुगोपाल और रणदीप सुरजेवाला विधायकों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन इस जातीय असंतोष को थामने के लिए हाईकमान को कम से कम दो या तीन डिप्टी सीएम की घोषणा करनी पड़ सकती है। इस बड़े बदलाव के बीच जब के. एच. मुनियप्पा से बात की गई, तो उन्होंने बड़ी चालाकी से कहा कि यह लोकतंत्र का सामान्य ढर्रा है, शाम तक आलाकमान सब संभाल लेगा। बहरहाल, कर्नाटक की धरती पर शुरू हुआ यह नया गृहयुद्ध यह तय करेगा कि क्या कांग्रेस अपनी आंतरिक गुटबाजी पर काबू पाकर सरकार की गति (Karnataka Congress Crisis) को बरकरार रख पाती है, या फिर शपथ ग्रहण से पहले ही यह किला ढहने की कगार पर पहुंच जाएगा।




