सीजी भास्कर, 04 जुलाई : छत्तीसगढ़ में मानसून (Chhattisgarh Monsoon Delay ) की सुस्ती और अनियमित चाल ने अन्नदाताओं की पेशानी पर बल ला दिया है। जुलाई की शुरुआत के बावजूद प्रदेश के कई जिलों में सामान्य से बेहद कम बारिश और खंडवर्षा (रुक-रुक कर कुछ इलाकों में बारिश) ने खरीफ सीजन की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि सरकार द्वारा तय 48.69 लाख हेक्टेयर के विशाल बुआई लक्ष्य के मुकाबले अब तक महज 5 लाख हेक्टेयर यानी केवल 10 प्रतिशत क्षेत्र में ही बोनी हो सकी है। इस गंभीर संकट को देखते हुए कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को अपनी पारंपरिक खेती की रणनीति को तुरंत बदलने की बेहद कड़क और दोटूक सलाह दी है।
90 से 110 दिनों वाली धान की किस्मों को ही चुनें
कृषि वैज्ञानिकों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि जुलाई के पहले पखवाड़े (15 जुलाई) तक प्रदेश में झमाझम और पर्याप्त बारिश नहीं होती है, तो लंबी अवधि में पकने वाली धान की पारंपरिक किस्मों को खेतों में डालना घाटे का सौदा साबित होगा। ऐसी स्थिति में किसानों को कम अवधि वाली धान की किस्मों और डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR – सीधे बुआई तकनीक) की ओर रुख करना ही होगा। विशेषज्ञों ने देर से बुआई के लिए कुछ खास किस्मों को अपनाने की कड़क हिदायत दी है:
90 से 100 दिन वाली किस्में: समलेश्वरी और दंतेश्वरी धान।
100 से 110 दिन वाली किस्में: आईआर-64, इंदिरा बारानी-1, इंदिरा बारानी-2 और सहभागी धान।
ऊंचे खेतों में धान लगाना बंद करें
कृषि महाविद्यालय के विशेषज्ञों ने उन किसानों को विशेष रूप से सचेत किया है जिनकी जमीनें ‘उच्च भूमि’ (ऊंचे मैदानी इलाके) में आती हैं। वहां धान की फसल के बजाय कम पानी में बंपर पैदावार देने वाली दलहन और तिलहन फसलों को प्राथमिकता देने को कहा गया है। अरहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, तिल, रामतिल और सोयाबीन जैसी फसलें कम नमी में भी किसानों की लागत वसूल करा सकती हैं। इसके साथ ही, खरपतवार नियंत्रण और पौधों की बेहतर वृद्धि के लिए ‘कतार पद्धति’ (लाइन सोइंग) से ही बुआई करने की अपील की गई है।
नैनो यूरिया का लें सहारा
संकट की इस घड़ी में कृषि विभाग ने आपातकालीन गाइडलाइन भी जारी की है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि 15 जुलाई तक खेतों में डाली गई फसलों का अंकुरण नहीं हो पाता है, तो दोबारा बुआई करते समय किसानों को सामान्य से 10 प्रतिशत अधिक बीज का उपयोग करना चाहिए। इसके साथ ही फसल को पोषण देने के लिए आवश्यकतानुसार नैनो यूरिया या दो प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव करें, जबकि दलहनी और तिलहनी फसलों की सुरक्षा के लिए डीएपी (DAP) का पर्णीय छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
मौसम के इस बदले मिजाज और सूखे के खतरे से निपटने के लिए कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे किसी भी बहकावे में आए बिना तुरंत अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि अधिकारियों से संपर्क कर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ही बीजों का चयन करें, ताकि इस साल होने वाले बड़े आर्थिक नुकसान से बचा जा सके।



