सीजी भास्कर, 11 जुलाई : छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के सुदूर वनांचल और कभी माओवादी प्रभावित रहे आमाबेड़ा तहसील के ग्राम चिचगांव के शिक्षित किसान सोनूराम ध्रुव (Organic Farming Success ) ने यह साबित कर दिया है कि यदि खेती को वैज्ञानिक सोच और आधुनिक तकनीक से किया जाए तो यह किसी भी नौकरी से कम लाभदायक नहीं है। अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर (एमए) करने के बाद उन्होंने नौकरी की तलाश करने के बजाय अपनी 10 एकड़ कृषि भूमि पर एकीकृत जैविक खेती (Integrated Farming System) को अपनाया। आज वे जैविक खेती, बागवानी, पशुपालन और आधुनिक सिंचाई तकनीक के जरिए हर साल 8 लाख रुपये से अधिक की शुद्ध आय अर्जित कर रहे हैं और क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।
2015 से शुरू किया जैविक खेती का सफर
सोनूराम ध्रुव ने वर्ष 2015 में जैविक खेती की शुरुआत की थी। शुरुआती दौर में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। लगातार मेहनत और वैज्ञानिक तरीके अपनाने का परिणाम यह रहा कि आज वे राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP) के तहत प्रमाणित जैविक किसान हैं। उन्हें छत्तीसगढ़ ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन समिति (CGOCERT) और भारत वानिकी एवं कृषि संस्थान द्वारा निरीक्षण के बाद जैविक खेती का प्रमाण-पत्र भी प्राप्त हुआ है।
10 एकड़ में अपनाई एकीकृत खेती की आधुनिक पद्धति
सोनूराम अपनी 10 एकड़ कृषि भूमि में समन्वित कृषि प्रणाली (Integrated Farming System) के तहत विभिन्न फसलों की खेती करते हैं। करीब चार एकड़ में वे शत-प्रतिशत जैविक सुगंधित चिन्नौर धान और औषधीय गुणों से भरपूर ब्लैक राइस (काला धान) उगाते हैं। इसके अलावा उन्होंने 400 काली मिर्च के पौधे लगाए हैं, जिनमें अब उत्पादन शुरू हो गया है। वे गेहूं, उड़द, कुल्थी, रागी और औषधीय काली हल्दी जैसी नकदी और मसाला फसलों की भी खेती कर रहे हैं। खेती के साथ आम की बागवानी और गौ-पालन भी करते हैं, जिससे खेतों के लिए जैविक खाद आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
ड्रिप सिंचाई और प्राकृतिक खेती से बढ़ा मुनाफा
कम पानी में अधिक उत्पादन के लिए सोनूराम ने अपने खेतों में ड्रिप सिंचाई (टपक सिंचाई) प्रणाली स्थापित की है। साथ ही वे वृक्ष आयुर्वेद आधारित प्राकृतिक खेती की ताराचंद बेलजी तकनीक का उपयोग करते हैं, जो पंचमहाभूत—भूमि, जल, वायु, अग्नि और आकाश—के संतुलन पर आधारित है। उनका मानना है कि प्राकृतिक संसाधनों के अनुरूप खेती करने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और बेहतर गुणवत्ता वाली फसल प्राप्त होती है।
घर पर तैयार करते हैं जैविक खाद और कीटनाशक
सोनूराम रासायनिक खाद और बाजार के महंगे कीटनाशकों पर निर्भर नहीं हैं। वे नींबू, पपीता, हर्रा और अन्य स्थानीय वनस्पतियों से जीवामृत, जैविक घोल और प्राकृतिक कीटनाशक स्वयं तैयार करते हैं। इससे खेती की लागत काफी कम हो गई है और उत्पादन पूरी तरह जैविक बना हुआ है।
150 रुपये किलो बिकता है चिन्नौर चावल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “खर्च कम करें, लाभ बढ़ाएं” संदेश से प्रेरित होकर उन्होंने सॉइल हेल्थ कार्ड के आधार पर मिट्टी सुधार का कार्य भी किया। खेत में तिल की खेती कर उसके अवशेषों को मिट्टी में मिलाने से जैविक कार्बन और पीएच स्तर में सुधार हुआ। वर्तमान में वे खरीफ सीजन में प्रति एकड़ लगभग 20 क्विंटल धान का उत्पादन लेते हैं। उनका जैविक चिन्नौर चावल बाजार में 150 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकता है। खेती, बागवानी और पशुपालन से उन्हें हर वर्ष 8 लाख रुपये से अधिक की शुद्ध आय प्राप्त हो रही है।
दर्जनों किसानों के लिए बने प्रेरणा स्रोत
सुदूर वनांचल क्षेत्र के किसान सोनूराम ध्रुव आज अपने क्षेत्र के कई किसानों को जैविक और प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रशिक्षित और प्रेरित कर रहे हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि यदि सरकारी योजनाओं, वैज्ञानिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान का सही समन्वय किया जाए, तो खेती को लाभदायक व्यवसाय में बदला जा सकता है और ग्रामीण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम की जा सकती है।



