सीजी भास्कर, 20 जून : बस्तर जिले में धान खरीदी के बाद सामने आए धान सूखत (Paddy Loss News ) के मामले ने अब बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। समय पर धान का उठाव नहीं होने के कारण बड़ी मात्रा में धान का वजन कम हो गया, जिससे करोड़ों रुपये के नुकसान का आंकलन किया गया है। इस मुद्दे को लेकर सहकारी समिति कर्मचारियों और शासन-प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बनती नजर आ रही है।
जानकारी के अनुसार जिले में खरीदी के बाद लंबे समय तक धान का उठाव नहीं होने से लगभग 50 हजार क्विंटल धान की सूखत दर्ज की गई है। प्रारंभिक आकलन के मुताबिक इससे करीब 15 करोड़ 50 लाख रुपये की आर्थिक क्षति हुई है। मामले में अब जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, जिसके चलते सहकारी समितियों के कर्मचारियों में चिंता और नाराजगी बढ़ गई है।
कर्मचारियों ने सरकार के सामने रखी बड़ी मांग
जिला सहकारी कर्मचारी संघ का कहना है कि धान का उठाव करना समितियों की जिम्मेदारी नहीं थी। धान खरीदी के बाद उसके परिवहन और उठाव की व्यवस्था संबंधित एजेंसियों द्वारा की जानी थी। ऐसे में यदि समय पर उठाव नहीं होने से धान में सूखत आई है तो उसकी भरपाई कर्मचारियों या समितियों से करना उचित नहीं होगा।
इसी मांग को लेकर कर्मचारी संघ ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और सहकारिता मंत्री को ज्ञापन सौंपते हुए सूखत की राशि की वसूली नहीं करने की मांग की है।
धान खरीदी बहिष्कार की चेतावनी
कर्मचारी संघ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि इस मामले में राहत नहीं दी गई और कर्मचारियों पर आर्थिक बोझ डाला गया तो वे आगामी धान खरीदी सीजन का बहिष्कार करने पर मजबूर होंगे। संघ का कहना है कि कर्मचारियों को उन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता जिन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था।
79 में से 77 केंद्रों में दर्ज हुई सूखत
सूत्रों के अनुसार जिले के 79 धान उपार्जन केंद्रों में से 77 केंद्रों में सूखत दर्ज की गई है। सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र बकावंड ब्लॉक बताया जा रहा है, जहां धान की कमी का आंकड़ा अन्य क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा है। इससे पूरे जिले में सहकारी समितियों के सामने जवाबदेही का संकट खड़ा हो गया है।
मार्कफेड ने दिए जांच और रिकवरी के निर्देश
दूसरी ओर मार्कफेड ने धान की कमी वाले केंद्रों में जांच करने और नियमानुसार रिकवरी की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश जारी किए हैं। संबंधित अधिकारियों को सूखत के कारणों की जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने कहा गया है।
अधिकारियों का कहना है कि शासन के नियमों के अनुरूप ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। वहीं कर्मचारी संगठन इस मामले में राहत की उम्मीद लगाए हुए हैं।
सरकार के फैसले पर टिकी निगाहें
धान सूखत का यह मामला अब केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और सहकारी समितियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर रहा है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकला तो आगामी धान खरीदी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। ऐसे में अब सभी की निगाहें राज्य सरकार के अगले निर्णय पर टिकी हुई हैं।





