सीजी भास्कर 5 दिसंबर Sand Mine Tender Dispute: कोरिया ज़िले के बैकुंठपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत चिरमी में रेत खदान का मामला इस कदर भड़क गया है कि बुधवार से गांव का माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है।
गांव की महिलाओं और सरपंच ने एकजुट होकर कलेक्टर कार्यालय के बाहर धरना दिया और कहा—“अगर आप पूरा रेत ले जाएंगे तो हम अपने घर कैसे बनाएंगे?”
बिना सहमति के Tender जारी”—ग्राम पंचायत ने लगाए गंभीर आरोप
इस विरोध की जड़ में वह आरोप है जो ग्रामीण पिछले दो दिनों से लगातार दोहरा रहे हैं।
उनका कहना है कि चिरमी गेज नदी रेत खदान का Tender (Sand Mine Tender Dispute) ग्राम पंचायत को बताए बिना, एक निजी एजेंसी को दे दिया गया।
चौंकाने वाली बात यह कि पंचायत को इसकी जानकारी किसी सरकारी पत्र से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर वायरल नोटिस के ज़रिए मिली, जिसके बाद गांव में नाराज़गी की लहर दौड़ गई।
“पंचायत को दरकिनार किया गया”—सरपंच और पंचों ने शुरू किया आक्रोश प्रदर्शन
सरपंच, पंच और गांव के वरिष्ठ लोगों ने माना कि प्रशासन ने ग्राम पंचायत की अनुमति के बगैर टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली।
उनका आरोप है कि यह पूरा मामला “निजी व्यक्ति को लाभ पहुंचाने” जैसा लग रहा है।
ग्रामीणों की स्पष्ट मांग है—
“मौजूदा टेंडर तुरंत रद्द किया जाए और रेत खदान का संचालन अधिकार पंचायत को लौटाया जाए।”
राजनीतिक समर्थन भी जुड़ा—ग्रामीणों की मांग को बताया जायज़
इस मुद्दे ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है।
एक क्षेत्रीय राजनीतिक संगठन के जिला अध्यक्ष ने ग्रामीणों की आवाज़ का समर्थन करते हुए कहा कि “बिना पंचायत की सहमति के कोई भी Sand Mine Tender वैध नहीं माना जा सकता।”
प्रशासन की पहली प्रतिक्रिया—“प्रक्रिया ऑनलाइन हुई है”
ग्रामीणों ने तहसीलदार एम.पी. यादव को ज्ञापन सौंपा, जिसमें कहा गया कि उन्हें किसी भी स्तर पर रेत खदान की प्रक्रिया के बारे में नहीं बताया गया।
प्रशासन ने जवाब दिया कि यह नीलामी शासन के पोर्टल पर ऑनलाइन प्रक्रिया के तहत पूरी की गई है, और इसमें पंचायत की भी औपचारिक सहमति शामिल है।
अब ग्रामीणों की शिकायत को खनिज अधिकारी और कलेक्टर के स्तर पर भेजा जा रहा है, जहां अंतिम निर्णय होगा।
गांव की चिंता—“अगर रेत ही नहीं बचेगी, तो घर कैसे बनेंगे?”
गांव के एक बुजुर्ग ने कहा—
“हमारी सरकार कहती है कि गांवों में पक्के मकान बनेंगे… लेकिन अगर नदी का पूरा रेत ठेकेदार ले जाएगा, तो हम नींव भी किससे भरेंगे?”
यह बयान गांव में मौजूद वास्तविक चिंता को सामने लाता है—यह सिर्फ रेत नहीं, बल्कि आजीविका और घर बनाने का हक है।


