सीजी भास्कर, 10 अप्रैल। सुप्रीम कोर्ट ने एक भरण-पोषण (Maintenance) मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया है कि पत्नी की बुनियादी जरूरतों का ख्याल रखना पति की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी (Supreme Court Maintenance Case 2026) है। कोर्ट ने उस शख्स की दलील को खारिज कर दिया जिसने दावा किया था कि वह दिहाड़ी मजदूर के रूप में रोजाना केवल 325 रुपये कमाता है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि आज के दौर में 9 हजार रुपये मासिक आय की बात करना ‘अविश्वसनीय’ लगता है। कोर्ट ने पति की कम कमाई की दलील को दरकिनार करते हुए उसे हर महीने 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश जारी किया है।
30 लाख की एकमुश्त राशि पर अड़ी थी पत्नी (Supreme Court Maintenance Case 2026)
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब निचली अदालत ने पति को 6 लाख रुपये की एकमुश्त राशि (Alimony) देने का आदेश दिया था। पति ने इस आदेश का पालन भी किया, लेकिन पत्नी इस रकम से संतुष्ट नहीं थी।
उसने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और 30 लाख रुपये की मांग की। हाई कोर्ट द्वारा अर्जी खारिज होने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। सुनवाई के दौरान पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि या तो पति ताउम्र ₹12,000 मासिक भत्ता दे या फिर ₹30 लाख का एकमुश्त भुगतान करे।
पति की दलील: ‘बच्चों की पढ़ाई और कम आय का हवाला’
पति की ओर से पेश वकील जॉर्ज पोथन ने कोर्ट में दलील दी कि गुजारा भत्ता तय करते समय पति की वास्तविक आर्थिक स्थिति को देखा जाना चाहिए। वकील ने बताया कि उनका मुवक्किल हफ्ते के सातों दिन काम करता है और अपनी मामूली कमाई से बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी उठा रहा है।
पति का कहना था कि जब उसकी कुल मासिक आय ही 9 हजार रुपये के करीब (Supreme Court Maintenance Case 2026) है, तो वह 10 हजार रुपये का भत्ता कैसे दे सकता है? हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और आय छिपाने की संभावना की ओर इशारा किया।
कोर्ट की टिप्पणी: ‘इतनी कम आय पर भरोसा करना मुश्किल’
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि कुशल या अकुशल श्रम के मौजूदा दौर में कोई भी व्यक्ति इतनी कम आय पर नहीं (Supreme Court Maintenance Case 2026) रह रहा है। कोर्ट ने हाई कोर्ट के पुराने आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया और पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी को 10 हजार रुपये प्रति माह का भुगतान सुनिश्चित करे। बेंच ने साफ किया कि सामाजिक न्याय के तहत पति अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकता, भले ही वह खुद को कम आय वाला व्यक्ति क्यों न बताए।


