सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (29 मई) को राजस्थान सरकार को एक दोषी कैदी को 11 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसे अदालत के आदेश के बावजूद 24 दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता कोई मामूली विषय नहीं है। राज्य सरकार केवल इस कारण किसी व्यक्ति की आजादी को सीमित नहीं कर सकती कि उसके विभाग यह तय करने में समय लगा रहे हैं कि किसी मामले में अपील दायर करनी है या नहीं।
पीठ ने कहा, “अपीलकर्ता को 24 दिनों की अवैध हिरासत के लिए मुआवजा पाने का अधिकार है। किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सरकारी प्रशासनिक निर्णयों से कमतर नहीं आंका जा सकता। यदि ऐसा किया जाता है तो यह संविधान की मूल भावना के विपरीत होगा।”
यह मामला दौदयाल नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिसे 1967 के एक आपराधिक मामले में चार वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। वर्ष 2021 में राजस्थान हाईकोर्ट ने उसकी सजा को बरकरार रखा था, जिसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
दिसंबर 2023 में दौदयाल ने स्थायी पैरोल के लिए आवेदन किया था, लेकिन जनवरी 2024 में यह कहते हुए उसका आवेदन खारिज कर दिया गया कि उसने राजस्थान पैरोल नियमों के तहत नियमित पैरोल के तीन चरण पूरे नहीं किए हैं।
इसके बाद दौदयाल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 5 नवंबर 2024 को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने उसकी याचिका स्वीकार करते हुए एक लाख रुपये के निजी मुचलके और 50-50 हजार रुपये की दो जमानतें जमा कराने पर रिहा करने का आदेश दिया।
सभी शर्तें पूरी करने के बावजूद उसे रिहा नहीं किया गया। इसके बाद उसने बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका दायर की, जिस पर 6 दिसंबर 2024 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उसकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट में दौदयाल ने तर्क दिया कि रिहाई के आदेश और वास्तविक रिहाई के बीच का समय अवैध हिरासत था, जिसके लिए उसे मुआवजा मिलना चाहिए। उसने 8 लाख रुपये की मांग करते हुए कहा कि राज्य ने उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है।
राज्य सरकार ने देरी का कारण प्रशासनिक और नौकरशाही प्रक्रियाओं को बताया। सरकार को यह तय करने में समय लगा कि आदेश के खिलाफ अपील की जाए या नहीं। हालांकि इस दौरान किसी भी उच्च अदालत से रिहाई के आदेश पर रोक नहीं ली गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की रिहाई का आदेश जारी होने के बाद उसका पालन किया जाना अनिवार्य है। केवल तभी रिहाई रोकी जा सकती है जब कोई उच्च अदालत उस आदेश पर स्थगन (स्टे) दे।
अदालत ने कहा, “सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति दोषी ठहराया गया है, उसके संवैधानिक अधिकार कम नहीं हो जाते। राज्य का दायित्व है कि उसकी प्रशासनिक प्रक्रियाएं किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित न करें।”
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में रुदुल साह बनाम बिहार राज्य, भीम सिंह बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य और नीलबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य जैसे ऐतिहासिक मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि अनुच्छेद 21 के उल्लंघन पर मौद्रिक मुआवजा एक मान्यता प्राप्त कानूनी उपाय है।
अंततः अदालत ने माना कि राज्य सरकार ने न्यायिक आदेश के बावजूद अपीलकर्ता को 24 अतिरिक्त दिनों तक हिरासत में रखा, जो उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को 11 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।




